अहो स्थिरः कोऽपि तवेप्सितो युवा
चिराय कर्णोत्पलशून्यतां गते ।
उपेक्षते यः श्लथलम्बिनीर्जटाः
कपोलदेशे कलमाग्रपिङ्गलाः ॥
अहो स्थिरः कोऽपि तवेप्सितो युवा
चिराय कर्णोत्पलशून्यतां गते ।
उपेक्षते यः श्लथलम्बिनीर्जटाः
कपोलदेशे कलमाग्रपिङ्गलाः ॥
चिराय कर्णोत्पलशून्यतां गते ।
उपेक्षते यः श्लथलम्बिनीर्जटाः
कपोलदेशे कलमाग्रपिङ्गलाः ॥
अन्वयः
AI
अहो, तव ईप्सितः कः अपि युवा स्थिरः, यः चिराय कर्ण-उत्पल-शून्यताम् गते (सति), कपोल-देशे कलम-अग्र-पिङ्गलाः श्लथ-लम्बिनीः जटाः उपेक्षते ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अहो इति । अहो चित्रम् । तवेप्सित आप्तुमिष्टो युवा कोऽपि स्थिरः कठिनः । वर्तत इति शेषः । कुतः । यो युवा चिराय चिरात्प्रभृति कर्णोत्पलशून्यतां गते प्राप्ते कपोलदेशे गण्डस्थले श्लथाः शिथिलबन्धना अत एव लम्बिन्यस्ताः श्लथलम्बिनीः कलमाः शालिविशेषास्तेषामग्राणि तद्वत्पिङ्गला जटा उपेक्षते यस्त्वामीदृशीं दृष्ट्वा न व्यथते स नूनं वज्रहृदय इत्यर्थः
Summary
AI
"Ah, how hard-hearted must be that youth you desire! He disregards your ears that have long been without their lotus ornaments, and your loosely hanging matted locks, tawny like rice stalks, on your cheeks."
सारांश
AI
वह युवक अत्यंत कठोर हृदय होगा जो तुम्हारे कपोलों पर गिरती इन रूखी जटाओं की उपेक्षा कर रहा है, जबकि तुमने कानों के आभूषण भी त्याग दिए हैं।
पदच्छेदः
AI
| अहो | अहो | Ah! |
| स्थिरः | स्थिर (१.१) | hard-hearted |
| कः | किम् (१.१) | who |
| अपि | अपि | indeed |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| ईप्सितः | ईप्सित (√आप्+सन्+क्त, १.१) | desired one |
| युवा | युवन् (१.१) | youth |
| चिराय | चिराय | for a long time |
| कर्णोत्पलशून्यताम् | कर्ण–उत्पल–शून्यता (२.१) | the state of being without lotus-ear-ornaments |
| गते | गत (√गम्+क्त, ७.१) | having gone to |
| उपेक्षते | उपेक्षते (उप√ईक्ष् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | he disregards |
| यः | यद् (१.१) | who |
| श्लथलम्बिनीः | श्लथ–लम्बिनी (२.३) | loosely hanging |
| जटाः | जटा (२.३) | matted locks |
| कपोलदेशे | कपोल–देश (७.१) | on the region of your cheeks |
| कलमाग्रपिङ्गलाः | कलम–अग्र–पिङ्गल (२.३) | tawny like the tips of rice stalks |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | हो | स्थि | रः | को | ऽपि | त | वे | प्सि | तो | यु | वा |
| चि | रा | य | क | र्णो | त्प | ल | शू | न्य | तां | ग | ते |
| उ | पे | क्ष | ते | यः | श्ल | थ | ल | म्बि | नी | र्ज | टाः |
| क | पो | ल | दे | शे | क | ल | मा | ग्र | पि | ङ्ग | लाः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.