शिलाशयां तामनिकेतवासिनीं
निरन्तरास्वन्तरवातवृष्टिषु ।
व्यलोकयन्नुन्मिषितैस्तडिन्मयै-
र्महातपःसाक्ष्य इव स्थिताः क्षपाः ॥
शिलाशयां तामनिकेतवासिनीं
निरन्तरास्वन्तरवातवृष्टिषु ।
व्यलोकयन्नुन्मिषितैस्तडिन्मयै-
र्महातपःसाक्ष्य इव स्थिताः क्षपाः ॥
निरन्तरास्वन्तरवातवृष्टिषु ।
व्यलोकयन्नुन्मिषितैस्तडिन्मयै-
र्महातपःसाक्ष्य इव स्थिताः क्षपाः ॥
अन्वयः
AI
निरन्तरासु अन्तरवातवृष्टिषु शिलाशयाम् अनिकेतवासिनीम् ताम् (पार्वतीम्) क्षपाः तडिन्मयैः उन्मिषितैः (नेत्रैः) महातपःसाक्ष्यः इव स्थिताः (सत्यः) वि अलोकयन् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
शिलाशयामिति । निरन्तरासु नीरन्ध्रास्वन्तरे मध्ये वाती यासां तादृश्यो या वृष्टयस्तास्वन्तरवातवृष्टिषु । न निकेते गृहे वसतीत्यनिकेतवासिनीम् । अनावृतदेशवासिनीमित्यर्थः । शिलायां शेत इति शिलाशयां शिलातलशायिनीम् । `अधिकरणे शेतेः` (अष्टाध्यायी ३.२.१५ ) इत्यच्प्रत्ययः । तां पार्वतीं `साक्षाद्द्रष्टा साक्षी` । `साक्षाद्द्रष्टरि संज्ञायाम्` इति निप्रत्ययः । तस्य कर्म साक्ष्यं महातपसः साक्ष्ये स्थिताः क्षपास्तडिन्मयैर्विद्युद्द्रूपैतैरवलोकनैर्व्यलोकयन्निव । इवेति चक्षुषा विलोकनमेवोत्प्रेक्ष्यते । साक्ष्यं तु `आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च । अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ॥` इति प्रमाणसिद्धत्वान्नोत्प्रेक्ष्यमित्यनुसंधेयम्
Summary
AI
The nights, like witnesses to her great penance, watched Parvati, who was homeless and sleeping on a bare rock, through the incessant wind and rain with their flashing lightning-like eyes.
सारांश
AI
शिला पर सोने वाली और खुले आकाश के नीचे रहने वाली पार्वती की महान तपस्या को रात्रियों ने बिजली की चमक रूपी नेत्रों से साक्षात् देखा।
पदच्छेदः
AI
| शिलाशयाम् | शिला–शय (२.१) | sleeping on a rock |
| ताम् | तद् (२.१) | her |
| अनिकेतवासिनीम् | अनिकेत–वासिनी (२.१) | who was homeless |
| निरन्तरासु | निरन्तर (७.३) | in the incessant |
| अन्तरवातवृष्टिषु | अन्तर–वात–वृष्टि (७.३) | in the midst of wind and rain |
| व्यलोकयन् | व्यलोकयन् (वि√लोक् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | they watched |
| उन्मिषितैः | उन्मिषित (उद्√मिष्+क्त, ३.३) | with open (eyes) |
| तडिन्मयैः | तडिन्मय (३.३) | made of lightning |
| महातपःसाक्ष्यः | महत्–तपस्–साक्षिन् (१.३) | witnesses of the great penance |
| इव | इव | as if |
| स्थिताः | स्थित (√स्था+क्त, १.३) | standing |
| क्षपाः | क्षपा (१.३) | the nights |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शि | ला | श | यां | ता | म | नि | के | त | वा | सि | नीं |
| नि | र | न्त | रा | स्व | न्त | र | वा | त | वृ | ष्टि | षु |
| व्य | लो | क | य | न्नु | न्मि | षि | तै | स्त | डि | न्म | यै |
| र्म | हा | त | पः | सा | क्ष्य | इ | व | स्थि | ताः | क्ष | पाः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.