शुचौ चतुर्णां ज्वलतां हविर्भुजां
शुचिस्मिता मध्यगता सुमध्यमा ।
विजित्य नेत्रप्रतिघातिनीं प्रभा-
मनन्यदृष्टिः सवितारमैक्षत ॥
शुचौ चतुर्णां ज्वलतां हविर्भुजां
शुचिस्मिता मध्यगता सुमध्यमा ।
विजित्य नेत्रप्रतिघातिनीं प्रभा-
मनन्यदृष्टिः सवितारमैक्षत ॥
शुचिस्मिता मध्यगता सुमध्यमा ।
विजित्य नेत्रप्रतिघातिनीं प्रभा-
मनन्यदृष्टिः सवितारमैक्षत ॥
अन्वयः
AI
शुचौ सु-मध्यमा शुचि-स्मिता चतुर्णाम् ज्वलताम् हविर्भुजाम् मध्य-गता सती, नेत्र-प्रतिघातिनीम् प्रभाम् विजित्य, अनन्य-दृष्टिः सती सवितारम् ऐक्षत ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
शुचाविति ॥ शुचौ ग्रीष्मे शुचिस्मिता विशदमन्दहासा सुमध्यमा पार्वती ज्वलतां दीप्तिमतां चतुर्णां हविर्भुजामग्नीनां मध्यगता सती । नेत्रे प्रतिहन्तीति तां नेत्रप्रतिघातिनीं प्रभां सावित्रं तेजो विजित्य न विद्यतेऽन्यत्र दृष्टिर्यस्याः सानन्यदृष्टिः सती सवितारं सूर्यमैक्षत ददर्श । `ग्रीष्मे पञ्चाग्निमध्यस्थो वर्षासु स्थण्डिलेशयः` इति स्मरणात् । पञ्चाग्निमध्ये तपश्चचारेत्यर्थः तत्र सवितैव पञ्चमोऽग्निः- `अग्निः सविता सवितैवाग्रिः` इति श्रौतलिङ्गात्
Summary
AI
In the summer, the slender-waisted one with a pure smile sat amidst four blazing fires. Overcoming the blinding glare, with unwavering gaze, she looked at the sun.
सारांश
AI
भीषण गर्मी में चारों ओर अग्नि जलाकर पार्वती उसके मध्य बैठीं और सूर्य की आँखों को चौंधियाने वाली चमक को जीतते हुए एकटक उसे देखने लगीं।
पदच्छेदः
AI
| शुचौ | शुचि (७.१) | In the summer |
| चतुर्णाम् | चतुर् (६.३) | of four |
| ज्वलताम् | ज्वलत् (√ज्वल्+शतृ, ६.३) | blazing |
| हविर्भुजाम् | हविर्भुज् (६.३) | fires (eaters of oblations) |
| शुचिस्मिता | शुचि–स्मित (१.१) | she with a pure smile |
| मध्यगता | मध्य–गता (√गम्+क्त, १.१) | situated in the middle |
| सुमध्यमा | सु–मध्यम (१.१) | the slender-waisted one |
| विजित्य | विजित्य (वि√जि+ल्यप्) | having overcome |
| नेत्रप्रतिघातिनीम् | नेत्र–प्रतिघातिनी (२.१) | the blinding |
| प्रभाम् | प्रभा (२.१) | glare |
| अनन्यदृष्टिः | अनन्य–दृष्टि (१.१) | with unwavering gaze |
| सवितारम् | सवितृ (२.१) | the sun |
| ऐक्षत | ऐक्षत (√ईक्ष् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | gazed at |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शु | चौ | च | तु | र्णां | ज्व | ल | तां | ह | वि | र्भु | जां |
| शु | चि | स्मि | ता | म | ध्य | ग | ता | सु | म | ध्य | मा |
| वि | जि | त्य | ने | त्र | प्र | ति | घा | ति | नीं | प्र | भा |
| म | न | न्य | दृ | ष्टिः | स | वि | ता | र | मै | क्ष | त |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.