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महार्हशय्यापरिवर्तनच्युतैः
स्वकेशपुष्पैरपि या स्म दूयते ।
अशेत सा बाहुलतोपधायिनी
निषेदुषी स्थण्डिल एव केवले ॥

अन्वयः AI या महार्ह-शय्या-परिवर्तन-च्युतैः स्व-केश-पुष्पैः अपि दूयते स्म, सा बाहु-लता-उपधायिनी सती केवले स्थण्डिले एव निषेदुषी अशेत ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) महार्हेति ॥ महानर्हो मूल्यं यस्याः सा महार्हा श्रेष्ठा या शय्या तस्यां परिवर्तनेन लुण्ठनेन च्युतैर्भ्रष्टैः स्वकेशपुष्पैरपि या देवी दूयते स्म क्लिश्यते स्म । पुष्पाधिकसौकुमार्यादिति भावः । सा देवी बाहुलतामुपधत्त उपधानीकरोतीति बाहुलतोपधायिनी सती केवले संस्तरणरहिते स्थण्डिले भूमावेवाशेत शयितवती । तथा निषेदुष्युपविष्टा च । `क्वसुश्च` (अष्टाध्यायी ३.२.१०७ ) इति क्वसुः । `उगितश्च` (अष्टाध्यायी ४.१.६ ) इति ङीप् । भूमावेव शयनादिव्यवहारो न जातूपरीत्यर्थः
Summary AI She who used to feel discomfort even from the flowers falling from her own hair as she turned on her costly bed, now slept on the bare ground alone, using her creeper-like arm as a pillow.
सारांश AI जो पार्वती कोमल शय्या पर फूलों के गिरने से भी दुखी हो जाती थीं, वे अब अपनी भुजा को तकिया बनाकर कठोर भूमि पर ही सोने लगीं।
पदच्छेदः AI
महार्हशय्यापरिवर्तनच्युतैःमहाअर्हशय्यापरिवर्तनच्युत (√च्यु+क्त, ३.३) by those fallen by turning on a costly bed
स्वकेशपुष्पैःस्वकेशपुष्प (३.३) by the flowers from her own hair
अपिअपि even
यायद् (१.१) She who
स्मस्म (past tense marker)
दूयतेदूयते (√दू भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) was pained
अशेतअशेत (√शी कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) slept
सातद् (१.१) she
बाहुलतोपधायिनीबाहुलता–उपधायिनी (१.१) using her creeper-like arm as a pillow
निषेदुषीनिषेद्वस् (नि√सद्+क्वसु, १.१) having sat down
स्थण्डिलेस्थण्डिल (७.१) on the ground
एवएव alone
केवलेकेवल (७.१) bare
छन्दः वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२
हा र्ह य्या रि र्त च्यु तैः
स्व के पु ष्पै पि या स्म दू ते
शे सा बा हु तो धा यि नी
नि षे दु षी स्थ ण्डि के ले
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