अन्वयः
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हे स्मर, गोत्र-स्खलितेषु मेखला-गुणैः बन्धनम् उत च्युत-केशर-दूषित-ईक्षणानि अवतंस-उत्पल-ताडनानि वा स्मरसि?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
स्मरसीति । हे स्मर ! गोत्रस्खलितेषु नामव्यत्यासेषु । `गोत्रं नाम्न्यचले कुले` इति विश्वः । मेखलागुणैर्बन्धनं स्मरस्युत स्मरसि वा । `विकल्पे किं किमुत च` इत्यमरः । च्युतकेशरैर्भ्रष्टकिञ्जल्कैर्दूषिते ईक्षणे येषु तान्यवतंसोत्पलताडनानि । सधूलिक्षेपताडनानीत्यर्थः । स्मरसि वा । अपकारस्मरणादिदमदर्शनमिति भावः
Summary
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"O Smara (Kama), do you remember being bound with my girdle-strings when you mistakenly called out another's name? Or the playful beatings with my ear-lotuses, their filaments scattered, blurring my vision?"
सारांश
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हे स्मर! क्या तुम्हें याद है जब तुम नाम भूल जाते थे तो मैं तुम्हें अपनी करधनी से बाँध देती थी या फूलों के गहनों से तुम्हें सप्रेम मारती थी?
पदच्छेदः
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| स्मरसि | स्मरसि (√स्मृ कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | do you remember? |
| स्मर | स्मर (८.१) | O Smara (Kama) |
| मेखलागुणैः | मेखला–गुण (३.३) | with girdle-strings |
| उत | उत | or |
| गोत्रस्खलितेषु | गोत्र–स्खलित (७.३) | in slips of the name |
| बन्धनम् | बन्धन (२.१) | the binding |
| च्युतकेशरदूषितेक्षणानि | च्युत–केशर–दूषित–ईक्षण (२.३) | with vision blurred by fallen filaments |
| अवतंसोत्पलताडनानि | अवतंस–उत्पल–ताडन (२.३) | the beatings with ear-lotuses |
| वा | वा | or |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्म | र | सि | स्म | र | मे | ख | ला | गु | णै | |
| रु | त | गो | त्र | स्ख | लि | ते | षु | ब | न्ध | नम् |
| च्यु | त | के | श | र | दू | षि | ते | क्ष | णा | |
| न्य | व | तं | सो | त्प | ल | ता | ड | ना | नि | वा |
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