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अथ मदनवधूरुपप्लवान्तं
व्यसनकृशा परिपालयां बभूव ।
शशिन इव दिवातनस्य लेखा
किरणपरिक्षयधूसरा प्रदोषम् ॥

अन्वयः AI अथ व्यसनकृशा मदनवधूः उपप्लवान्तं परिपालयाम् बभूव, इव किरणपरिक्षयधूसरा दिवातनस्य शशिनः लेखा प्रदोषम् (परिपालयाम् बभूव) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) अथेति ॥ अथानन्तरं व्यसनेन दुःखेन कृशा मदनवधू रतिरुपप्लवान्तं विपदवधिं किरणपरिक्षयेण धूसरा मलिना दिवातनस्य दिनभवस्य । `सायंचिरम्` इत्यादिना ट्युप्रत्ययः । शशिनश्चन्द्रस्य लेखा प्रदोषं रात्रिमिव परिपालयांबभूव प्रतीक्षांचक्रे । पुष्पिताग्रावृत्तम्- `अयुजि नयुगरेफतो यकारो युजि च नजौ जरगाश्च पुष्पिताग्रा` इति लक्षणात्
Summary AI Then Rati, the wife of Madana, emaciated by grief, waited for the end of her calamity, just as the pale sliver of the daytime moon, faint from the loss of its rays, waits for the evening.
सारांश AI दुःख से क्षीण हुई रति अपने संकट के अंत की प्रतीक्षा वैसे ही करने लगी, जैसे दिन के समय फीकी पड़ी चंद्रमा की कला सायंकाल की प्रतीक्षा करती है।
पदच्छेदः AI
अथअथ Then
मदनवधूःमदनवधू (१.१) the wife of Madana (Rati)
उपप्लवान्तम्उपप्लवअन्त (२.१) the end of the calamity
व्यसनकृशाव्यसनकृश (१.१) emaciated by grief
परिपालयाम्परिपालयाम् (परि√पाल्+णिच्+आम्) waited for
बभूवबभूव (√भू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) became (auxiliary verb)
शशिनःशशिन् (६.१) of the moon
इवइव like
दिवातनस्यदिवातन (६.१) of the daytime
लेखालेखा (१.१) a streak/sliver
किरणपरिक्षयधूसराकिरणपरिक्षयधूसरा (१.१) pale from the loss of its rays
प्रदोषम्प्रदोष (२.१) the evening
छन्दः पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२ १३
धू रु प्ल वा न्तं
व्य कृ शा रि पा यां भू
शि दि वा स्य ले खा
कि रि क्ष धू रा प्र दो षम्
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