इत्थं रतेः किमपि भूतमदृश्यरूपं
मन्दीचकार मरणव्यवसायबुद्धिम् ।
तत्प्रत्ययाच्च कुसुमायुधबन्धुरेना-
माश्वासयत्सुचरितार्थपदैर्वचोभिः ॥
इत्थं रतेः किमपि भूतमदृश्यरूपं
मन्दीचकार मरणव्यवसायबुद्धिम् ।
तत्प्रत्ययाच्च कुसुमायुधबन्धुरेना-
माश्वासयत्सुचरितार्थपदैर्वचोभिः ॥
मन्दीचकार मरणव्यवसायबुद्धिम् ।
तत्प्रत्ययाच्च कुसुमायुधबन्धुरेना-
माश्वासयत्सुचरितार्थपदैर्वचोभिः ॥
अन्वयः
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इत्थम् अदृश्य-रूपम् किम् अपि भूतम् रतेः मरण-व्यवसाय-बुद्धिम् मन्दीचकार। तत्-प्रत्ययात् च कुसुम-आयुध-बन्धुः (मधुः) एनाम् सु-चरित-अर्थ-पदैः वचोभिः आश्वासयत्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
इत्थमिति ॥ इत्थमनेन प्रकारेणादृश्यरुपं किमपि भूतं कश्चित्प्राणी । `युक्तेक्ष्मादावृते भूतं प्राण्यतोते समे त्रिषु` इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१०२ ) । रतेर्मदनदाराणां मरणव्यवसायबुद्धिं मरणोद्योगबुद्धिं मन्दीचकार । निवारयामासेत्यर्थः । `मूढाल्पापटुनिर्भाग्या मन्दाः` इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१०२ ) । अथ कुसुमायुधबन्धुर्वसन्तश्च तत्प्रत्ययात्तस्मिन्भूते विश्वासात् । `प्रत्ययोऽधीनशपथज्ञानविश्वासहेतुषु` इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१०२ ) । एनां रतिं सुष्ठु चरितार्थानि पदानि येषां तैर्वचोभिर्वाक्यैराश्वासयत् । सर्वथा ते देवताप्रसादात्प्रियसंगमो भविष्यतीत्यादिवचनैरस्या दुःखमपाचकारेत्यर्थः
Summary
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Thus, some invisible being weakened Rati's resolve to die. And because of his trust in that voice, Madhu, the friend of Kama, also consoled her with eloquent and meaningful words.
सारांश
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इस प्रकार किसी अदृश्य शक्ति ने रति के मरने के विचार को धीमा कर दिया, और उस पर भरोसा करके कामदेव के मित्र वसंत ने उसे उचित वचनों से ढांढस बंधाया।
पदच्छेदः
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| इत्थम् | इत्थम् | Thus |
| रतेः | रति (६.१) | of Rati |
| किमपि | किम्–अपि | some |
| भूतम् | भूत (√भू+क्त, १.१) | being |
| अदृश्यरूपम् | अदृश्य–रूप (१.१) | of invisible form |
| मन्दीचकार | मन्दीचकार (√मन्दीकृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | weakened |
| मरणव्यवसायबुद्धिम् | मरण–व्यवसाय–बुद्धि (२.१) | the resolve of her intention to die |
| तत्प्रत्ययात् | तत्–प्रत्यय (५.१) | from trust in that |
| च | च | and |
| कुसुमायुधबन्धुः | कुसुम-आयुध–बन्धु (१.१) | the friend of the flower-arrowed one |
| एनाम् | इदम् (२.१) | her |
| आश्वासयत् | आश्वासयत् (आ√श्वस् +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | consoled |
| सुचरितार्थपदैः | सु–चरित–अर्थ–पद (३.३) | with well-phrased and meaningful words |
| वचोभिः | वचस् (३.३) | with words |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | त्थं | र | तेः | कि | म | पि | भू | त | म | दृ | श्य | रू | पं |
| म | न्दी | च | का | र | म | र | ण | व्य | व | सा | य | बु | द्धिम् |
| त | त्प्र | त्य | या | च्च | कु | सु | मा | यु | ध | ब | न्धु | रे | ना |
| मा | श्वा | स | य | त्सु | च | रि | ता | र्थ | प | दै | र्व | चो | भिः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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