अन्वयः
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(हे) कुसुम-आयुध-पत्नि, तव भर्ता दुर्लभः न (अस्ति)। (सः) न चिरात् भविष्यति। येन कर्मणा सः हर-लोचन-अर्चिषि शलभत्वम् गतः, (तत्) शृणु।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
कुसुमेति ॥ हे कुसुमायुधपत्नि रते ! तव भर्ता चिराच्चिरं दुर्लभो न भविष्यति । किंत्वचिरमेव सुलभो भविष्यतीत्यर्थः । किंच श्रृणु । तत्कर्मेति शेषः । येन कर्मणा स ते भर्त्ता हरलोचनस्यार्चिर्ज्वाला । `ज्वाला भासो न पुंस्यर्चिः` इत्यमरः (अमरकोशः २.५.३१ ) । तस्मिञ्शलभत्वं पतङ्गत्वं गतः । `समौ पतङ्गशलभौ` इत्यमरः
Summary
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The voice said: "O wife of Kama, your husband is not lost forever; he will return soon. Listen to the deed by which he was reduced to a moth in the flame of Shiva's eye."
सारांश
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हे कामदेव की पत्नी! तुम्हारे पति तुम्हें शीघ्र ही पुनः प्राप्त होंगे। सुनो, किस कारणवश वे शिव की क्रोधाग्नि में पतंगे की तरह भस्म हो गए।
पदच्छेदः
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| कुसुमायुधपत्नि | कुसुम-आयुध–पत्नी (८.१) | O wife of the flower-arrowed one |
| दुर्लभः | दुर्लभ (१.१) | difficult to obtain |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| भर्ता | भर्तृ (१.१) | husband |
| न | न | not |
| चिरात् | चिरात् | after a long time |
| भविष्यति | भविष्यति (√भू कर्तरि लृट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | will be |
| शृणु | शृणु (√श्रु कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | listen |
| येन | यद् (३.१) | by which |
| सः | तद् (१.१) | he |
| कर्मणा | कर्मन् (३.१) | by deed |
| गतः | गत (√गम्+क्त, १.१) | went |
| शलभत्वम् | शलभत्व (२.१) | to the state of a moth |
| हरलोचनार्चिषि | हर–लोचन–अर्चिस् (७.१) | in the flame of Hara's eye |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कु | सु | मा | यु | ध | प | त्नि | दु | र्ल | भ | |
| स्त | व | भ | र्ता | न | चि | रा | द्भ | वि | ष्य | ति |
| शृ | णु | ये | न | स | क | र्म | णा | ग | तः | |
| श | ल | भ | त्वं | ह | र | लो | च | ना | र्चि | षि |
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