अन्वयः
AI
सः ते सखा अनिलाहतः दीपः इव गतः एव, न निवर्तते। अस्य दशा इव माम् अविषह्य-व्यसन-प्रधूषिताम् पश्य।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
गत इति । स ते सखाऽनिलाहतो वायुताडितो दीप इव गत एव न निवर्तते । अहमस्य दीपायमानस्य दशा वर्तिरिव । तिष्ठामीति शेषः । `दशा वर्ताववस्थायां वस्त्रान्तं स्युर्दशा अपि` । इति विश्वः । कुतः । अविषह्यव्यसनेन सोढुमशक्यदुःखप्रकर्षेण धूमितां संजातधूमां मां पश्य । धूमवत्त्वान्नष्टदीपदशासाम्यं धूमश्च व्यसनमेवेत्यर्थः
Summary
AI
"That friend of yours is gone for good, like a lamp extinguished by the wind, and does not return. Look at me, I am like its wick, consumed and blackened by unbearable sorrow."
सारांश
AI
हवा से बुझे दीपक की तरह तुम्हारे मित्र चले गए हैं। अब मेरी दशा देखो, मैं उस दीपक की बत्ती की तरह हूँ जो दुख के धुएँ से काली पड़ गई है।
पदच्छेदः
AI
| गतः | गत (√गम्+क्त, १.१) | gone |
| एव | एव | just |
| न | न | not |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| निवर्तते | निवर्तते (नि√वृत् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | he returns |
| सः | तद् (१.१) | that |
| सखा | सखि (१.१) | friend |
| दीपः | दीप (१.१) | lamp |
| इव | इव | like |
| अनिलाहतः | अनिल–आहत (१.१) | struck by the wind |
| अहम् | अस्मद् (१.१) | I |
| अस्य | इदम् (६.१) | of this (lamp) |
| दशा | दशा (१.१) | wick |
| इव | इव | like |
| पश्य | पश्य (√दृश् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | see |
| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
| अविषह्यव्यसनप्रधूषिताम् | अविषह्य–व्यसन–प्रधूषिता (प्र√धूष्+क्त, २.१) | defiled by unbearable sorrow |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग | त | ए | व | न | ते | नि | व | र्त | ते | |
| स | स | खा | दी | प | इ | वा | नि | ला | ह | तः |
| अ | ह | म | स्य | द | शे | व | प | श्य | मा | |
| म | वि | ष | ह्य | व्य | स | न | प्र | धू | षि | ताम् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.