अन्वयः
AI
अयि स्मर, संप्रति दर्शनम् देहि। एषः माधवः पर्युत्सुकः (अस्ति)। नृणाम् प्रेम दयितासु अनवस्थितम् (भवति), सुहृज्जने चलम् न खलु।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अयीति । अयि स्मर ! संप्रति दर्शनं देहि । एष माधवो वसन्तः पर्युत्सकस्त्वद्दर्शनोत्कण्ठितः । त्वामप्यनादृतवतोऽस्य को माधव इत्याशङ्क्याह- नृणां पुरुषाणां दयितासु प्रेमानवस्थितमस्थिरम् । चलमित्यर्थः । सुहृज्जने प्रेम तु न चलं खलु
Summary
AI
"Oh Smara, show yourself now! This Madhava (Spring) is anxious for you. A man's love for his beloved may be unsteady, but surely it is not fickle towards a friend."
सारांश
AI
हे कामदेव! अब दर्शन दो, तुम्हारा मित्र वसंत व्याकुल है। पुरुषों का प्रेम पत्नियों के प्रति भले ही चंचल हो, पर मित्रों के प्रति कभी कम नहीं होता।
पदच्छेदः
AI
| अयि | अयि | Oh |
| संप्रति | संप्रति | now |
| देहि | देहि (√दा कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | give |
| दर्शनम् | दर्शन (२.१) | sight |
| स्मर | स्मर (८.१) | O Smara |
| पर्युत्सुकः | पर्युत्सुक (१.१) | is anxious |
| एषः | एतद् (१.१) | this |
| माधवः | माधव (१.१) | Madhava (Spring) |
| दयितासु | दयिता (७.३) | towards beloved women |
| अनवस्थितम् | अनवस्थित (अव√स्था+क्त, १.१) | unsteady |
| नृणाम् | नृ (६.३) | of men |
| न | न | not |
| खलु | खलु | indeed |
| प्रेम | प्रेमन् (१.१) | love |
| चलम् | चल (१.१) | fickle |
| सुहृज्जने | सुहृद्–जन (७.१) | towards a friend |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | यि | सं | प्र | ति | दे | हि | द | र्श | नं | |
| स्म | र | प | र्यु | त्सु | क | ए | ष | मा | ध | वः |
| द | यि | ता | स्व | न | व | स्थि | तं | नृ | णां | |
| न | ख | लु | प्रे | म | च | लं | सु | हृ | ज्ज | ने |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.