अन्वयः
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उत्सङ्ग-निषण्ण-धन्वनः ते शरम् ऋजुताम् नयतः, मधुना सह सस्मितम् कथाम्, यत् नयन-उपान्त-विलोकितम् च, (तत् सर्वम्) स्मरामि।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
ऋजुतामिति । शरमृजुतामार्जवं नयत उत्सङ्गे निषण्णमङ्कगतं धनुर्यस्य तस्य । `धनुषश्च` (अष्टाध्यायी ५.४.१३२ ) इत्यनङादेशः । ते तव मधुना वसन्तेन सह `मधुर्दैत्ये वसत्ने च चैत्रे च` इति विश्वः । सस्मितां कथामालापं तथा यन्नयनोपान्तविलोकितमपाङ्गवीक्षणम् । तत् इत्यनुषङ्गः । तच्च स्मरामि
Summary
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"I remember you straightening an arrow, your bow resting on your lap; I remember your smiling conversations with Madhu (Spring), and that glance from the corner of your eye."
सारांश
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गोद में धनुष रखे हुए तुम्हारे बाण सीधा करने, वसंत के साथ तुम्हारी मुस्कुराहट भरी बातों और तुम्हारी तिरछी चितवनों की मुझे याद आ रही है।
पदच्छेदः
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| ऋजुताम् | ऋजुता (२.१) | straightness |
| नयतः | नयत् (√नी+शतृ, ६.१) | of you who was making |
| स्मरामि | स्मरामि (√स्मृ कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I remember |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| शरम् | शर (२.१) | arrow |
| उत्सङ्गनिषण्णधन्वनः | उत्सङ्ग–निषण्ण (नि√सद्+क्त)–धन्वन् (६.१) | of you whose bow was resting on your lap |
| मधुना | मधु (३.१) | with Madhu |
| सह | सह | with |
| सस्मितम् | सस्मितम् | with a smile |
| कथाम् | कथा (२.१) | conversation |
| नयनोपान्तविलोकितम् | नयन–उपान्त–विलोकित (वि√लोक्+क्त, २.१) | the glance from the corner of the eye |
| च | च | and |
| यत् | यद् (२.१) | that which |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ऋ | जु | तां | न | य | तः | स्म | रा | मि | ते | |
| श | र | मु | त्स | ङ्ग | नि | ष | ण्ण | ध | न्व | नः |
| म | धु | ना | स | ह | स | स्मि | तं | क | थां | |
| न | य | नो | पा | न्त | वि | लो | कि | तं | च | यत् |
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