अन्वयः
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हे प्रिय, यावत् दिवि चतुरैः सुर-कामिनी-जनैः न विलोभ्यसे, तावत् अहम् पतङ्ग-वर्त्मना एत्य पुनः ते अङ्क-आश्रयिणी भवामि।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अहमिति । अहं पतङ्गवर्त्मना शलभमार्गेण । अग्निप्रवेशेनेत्यर्थः । `पतङ्गः शलभे चाग्नौ मार्जारेऽर्के शरे खगे` । इति वैजयन्ती । एत्यागत्य पुनस्तेऽङ्काश्रयण्युत्सङ्गवर्तिनी भवामि संप्रत्येव भविष्यामि । `वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा` (अष्टाध्यायी ३.३.१३१ ) इति लट् । हे प्रिय ! दिवि स्वर्गे चतुरैः सुरकामिनीजनैरप्सरोगणैर्यावन्न विलोभ्यसे विलोभयिष्यसे । `यावत्पुरानिपातयोर्लट्` (अष्टाध्यायी ३.३.४ ) इति लट्
Summary
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"O beloved, before you are seduced in heaven by clever celestial damsels, I shall come, following the path of a moth into the flame, and once again take refuge in your lap."
सारांश
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हे प्रिय! इससे पहले कि स्वर्ग की अप्सराएँ तुम्हें अपने वश में कर लें, मैं अग्नि मार्ग से तुम्हारे पीछे आकर पुनः तुम्हारी गोद का आश्रय लूँगी।
पदच्छेदः
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| अहम् | अस्मद् (१.१) | I |
| एत्य | एत्य (√इ+ल्यप्) | having come |
| पतङ्गवर्त्मना | पतङ्ग–वर्त्मन् (३.१) | by the path of a moth |
| पुनः | पुनर् | again |
| अङ्काश्रयिणी | अङ्क–आश्रयिन् (१.१) | one who takes refuge in the lap |
| भवामि | भवामि (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I shall become |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| चतुरैः | चतुर (३.३) | by clever |
| सुरकामिनीजनैः | सुर–कामिनी–जन (३.३) | celestial damsels |
| प्रिय | प्रिय (८.१) | O beloved |
| यावत् | यावत् | before |
| न | न | not |
| विलोभ्यसे | विलोभ्यसे (वि√लुभ् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | you are seduced |
| दिवि | दिव् (७.१) | in heaven |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ह | मे | त्य | प | त | ङ्ग | व | र्त्म | ना | |
| पु | न | र | ङ्का | श्र | यि | णी | भ | वा | मि | ते |
| च | तु | रैः | सु | र | का | मि | नी | ज | नैः | |
| प्रि | य | या | व | न्न | वि | लो | भ्य | से | दि | वि |
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