अन्वयः
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सा प्रलय-अन्त-उन्मिषिते विलोचने अवधान-परे चकार। किन्तु अतृप्तयोः तयोः अत्यन्त-विलुप्त-दर्शनम् प्रियम् न विवेद।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अवेति । सा रतिः प्रलयान्ते मूर्च्छावसाने । `प्रलयो नष्टचेष्टता` इत्यमरः (अमरकोशः १.७.३५ ) । उन्मिषिते उन्मीलिते विलोचने । अवधानं परं प्रधानं ययोस्तेऽवधानपरे दिदृक्षयावहिते चकार । द्रष्टव्याभावात्तु न विवेदेत्याह- नेति । प्रियं काममतृप्तयोस्तृप्तिं न गतयोः । नित्यदिदृक्षमाणयोरित्यर्थः । तयोर्लोचनयोः । दर्शनक्रियापेक्षया संबन्धे षष्ठी । अत्यन्तविलुप्तं दर्शनं स्वलोचनयोः करणयोर्यस्य कर्मभूतस्य तमत्यन्तविलुप्तदर्शनं सन्तं न विवेद न ज्ञातवती । प्रियनाशापरिज्ञानाद्दिदृक्षांचक्र इति तात्पर्यार्थः
Summary
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She (Rati) made her eyes, which had opened at the end of her swoon, attentive. However, those insatiate eyes did not perceive her beloved, whose form had been completely destroyed.
सारांश
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प्रलय के अंत में जागने वाली के समान रति ने अपनी आँखें तो खोलीं, परंतु उसे अपने वे प्रियतम कहीं नहीं दिखे जिन्हें देखने की उसकी इच्छा अभी अतृप्त ही थी।
पदच्छेदः
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| अवधानपरे | अवधान–पर (२.२) | attentive |
| चकार | चकार (√कृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | she made |
| सा | तद् (१.१) | she |
| प्रलयान्तोन्मिषिते | प्रलय–अन्त–उन्मिषित (२.२) | opened at the end of her swoon |
| विलोचने | विलोचन (२.२) | her two eyes |
| न | न | not |
| विवेद | विवेद (√विद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | did she perceive |
| तयोः | तद् (६.२) | of those two (eyes) |
| अतृप्तयोः | अतृप्त (नञ्√तृप्+क्त, ६.२) | insatiate |
| प्रियम् | प्रिय (२.१) | her beloved |
| अत्यन्तविलुप्तदर्शनम् | अत्यन्त–विलुप्त–दर्शन (२.१) | whose form was completely destroyed |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | व | धा | न | प | रे | च | का | र | सा | |
| प्र | ल | या | न्तो | न्मि | षि | ते | वि | लो | च | ने |
| न | वि | वे | द | त | यो | र | तृ | प्त | योः | |
| प्रि | य | म | त्य | न्त | वि | लु | प्त | द | र्श | नम् |
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