सपदि मुकुलिताक्षीं रुद्रसंरम्भभीत्या
दुहितरमनुकम्प्यामद्रिरादाय दोर्भ्याम् ।
सुरगज इव बिभ्रत्पद्मिनीं दन्तलग्नां
प्रतिपथगतिरासीद्वेगदीर्घीकृताङ्गः ॥
सपदि मुकुलिताक्षीं रुद्रसंरम्भभीत्या
दुहितरमनुकम्प्यामद्रिरादाय दोर्भ्याम् ।
सुरगज इव बिभ्रत्पद्मिनीं दन्तलग्नां
प्रतिपथगतिरासीद्वेगदीर्घीकृताङ्गः ॥
दुहितरमनुकम्प्यामद्रिरादाय दोर्भ्याम् ।
सुरगज इव बिभ्रत्पद्मिनीं दन्तलग्नां
प्रतिपथगतिरासीद्वेगदीर्घीकृताङ्गः ॥
अन्वयः
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अद्रिः रुद्र-संरम्भ-भीत्या सपदि मुकुलित-अक्षीम् अनुकम्प्याम् दुहितरम् दोर्भ्याम् आदाय, दन्त-लग्नाम् पद्मिनीम् बिभ्रत् सुर-गजः इव, वेग-दीर्घी-कृत-अङ्गः सन् प्रतिपथ-गतिः आसीत्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
सपदीति । सपद्यद्रिर्हिमवान्रुद्रस्य संरम्भात्कोपाद्भीत्या । `संरम्भः संभ्रमे कोपे` इति विश्वः । मुकुलिताक्षीं निमीलितनेत्राम् । `बहुव्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात्षच्` इति षच्प्रत्ययः । `षिद्गौरादिभ्यश्च` इति ङीष् । अनुकम्पितुमर्हामनुकम्प्याम् । `ऋहलोर्ण्यत्` (अष्टाध्यायी ३.१.१२४ ) इति ण्यत्प्रत्ययः । दुहितरं दोर्भ्यामादाय दन्तयोर्लग्नां पद्मिनीं नलिनीं बिभ्रत्सुरगज इव वेगेन रयेण दीर्घीकृताङ्ग आयतीकृतशरीरः सन् । पन्थानं प्रतिगता मार्गानुसारिणी स गतिर्यस्य प्रतिपथगतिरासीत् । पन्थानमनुसृत्य जगामेत्यर्थः
Summary
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The Mountain (Himalaya), his body elongated by his haste, immediately took his pitiable daughter—whose eyes were closed in fear of Rudra's fury—in his arms and departed by the way he came, like a celestial elephant carrying a lotus plant stuck to its tusk.
सारांश
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हिमालय ने शिव के क्रोध से भयभीत और नेत्र बंद किए हुए अपनी दयामयी पुत्री को अपनी भुजाओं में वैसे ही उठा लिया जैसे कोई हाथी कमलिनी को अपने दांतों पर उठाता है, और वे तेजी से घर लौट आए।
पदच्छेदः
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| सपदि | सपदि | immediately |
| मुकुलिताक्षीम् | मुकुलित–अक्षि (२.१) | whose eyes were closed |
| रुद्रसंरम्भभीत्या | रुद्र–संरम्भ–भीति (३.१) | from fear of Rudra's fury |
| दुहितरम् | दुहितृ (२.१) | his daughter |
| अनुकम्प्याम् | अनुकम्प्य (अनु√कम्प्+यत्, २.१) | pitiable |
| अद्रिः | अद्रि (१.१) | the Mountain (Himalaya) |
| आदाय | आदाय (आ√दा+ल्यप्) | taking |
| दोर्भ्याम् | दोस् (३.२) | with his two arms |
| सुरगजः | सुर–गज (१.१) | a celestial elephant |
| इव | इव | like |
| बिभ्रत् | बिभ्रत् (√भृ+शतृ, १.१) | carrying |
| पद्मिनीम् | पद्मिनी (२.१) | a lotus plant |
| दन्तलग्नाम् | दन्त–लग्न (२.१) | stuck to its tusk |
| प्रतिपथगतिः | प्रतिपथ–गति (१.१) | whose movement was on the return path |
| आसीत् | आसीत् (√अस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| वेगदीर्घीकृताङ्गः | वेग–दीर्घीकृत–अङ्ग (१.१) | whose body was elongated by haste |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | प | दि | मु | कु | लि | ता | क्षीं | रु | द्र | सं | र | म्भ | भी | त्या |
| दु | हि | त | र | म | नु | क | म्प्या | म | द्रि | रा | दा | य | दो | र्भ्याम् |
| सु | र | ग | ज | इ | व | बि | भ्र | त्प | द्मि | नीं | द | न्त | ल | ग्नां |
| प्र | ति | प | थ | ग | ति | रा | सी | द्वे | ग | दी | र्घी | कृ | ता | ङ्गः |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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