कामेकपत्नीव्रतदुःखशीलां
लोलं मनश्चारुतया प्रविष्टाम् ।
नितम्बिनीमिच्छसि मुक्तलज्जां
कण्ठे स्वयंग्राहनिषक्तबाहुम् ॥
कामेकपत्नीव्रतदुःखशीलां
लोलं मनश्चारुतया प्रविष्टाम् ।
नितम्बिनीमिच्छसि मुक्तलज्जां
कण्ठे स्वयंग्राहनिषक्तबाहुम् ॥
लोलं मनश्चारुतया प्रविष्टाम् ।
नितम्बिनीमिच्छसि मुक्तलज्जां
कण्ठे स्वयंग्राहनिषक्तबाहुम् ॥
अन्वयः
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एकपत्नीव्रतदुःखशीलाम्, चारुतया लोलम् मनः प्रविष्टाम् काम् नितम्बिनीम्, मुक्तलज्जाम् सतीम्, कण्ठे स्वयंग्राहनिषक्तबाहुम् कर्तुम् इच्छसि?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
कामिति । एकः पतिर्यस्याः सैकपत्नी पतिव्रता । `नित्यं सपत्न्यादिषु` (अष्टाध्यायी ४.१.३५ ) इति ङीप् । तस्या व्रतं पातिव्रत्यं तेन दुःखशीलां दुःखस्वभावाम् । दृढव्रतामित्यर्थः । `शीलं स्वभावे सद्वृत्ते` इत्यमरः । चारुतया सुन्दरत्वेन हेतुना लोलं मनस्त्वच्चितं प्रविष्टां कां नितम्बिनीं नारीं मुक्तलज्जां सतीं कण्ठे स्वयंग्राहनिषक्तबाहुम् । स्वयं गृह्णातीति स्वयंग्राहा । `विभाषा ग्रहः` (अष्टाध्यायी ३.१.१४३ ) इति णप्रत्ययः । न च जलचर एव ग्राह इति नियमः । जलचरे ग्राह एवेति नियमादिति । स्वयंग्राहा च सा निषक्तबाहुश्च तां तथाभूतामिच्छसि । त्वदर्थे पतिव्रतामपि व्रताद्भ्रंशयिष्यामीत्यर्थः ॥ एतच्चेन्द्रस्य पारदारिकत्वादुक्तम् । तथा च श्रुतिः-- `अहल्यायै जारः` इति
Summary
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"Which shapely woman, though devoted to her husband, has captured your fickle mind with her charm? Do you wish for her to abandon her shame and spontaneously throw her arms around your neck in an embrace?"
सारांश
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किस पतिव्रता स्त्री को आप काम विह्वल और निर्लज्ज बनाना चाहते हैं, जो स्वयं आगे बढ़कर अपने प्रेमी के गले लग जाए?
पदच्छेदः
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| काम् | किम् (२.१) | which |
| एकपत्नीव्रतदुःखशीलाम् | एकपत्नीव्रत–दुःख–शीला (२.१) | who is distressed by the vow of fidelity to one husband |
| लोलम् | लोल (२.१) | fickle |
| मनः | मनस् (२.१) | mind |
| चारुतया | चारुता (३.१) | by her charm |
| प्रविष्टाम् | प्रविष्ट (प्र√विश्+क्त, २.१) | who has entered |
| नितम्बिनीम् | नितम्बिनी (२.१) | shapely woman |
| इच्छसि | इच्छसि (√इष् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | do you desire |
| मुक्तलज्जाम् | मुक्त–लज्जा (२.१) | to be freed from shame |
| कण्ठे | कण्ठ (७.१) | on the neck |
| स्वयंग्राहनिषक्तबाहुम् | स्वयंग्राह–निषक्त–बाहु (२.१) | with her arms clinging in a spontaneous embrace |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| का | मे | क | प | त्नी | व्र | त | दुः | ख | शी | लां |
| लो | लं | म | न | श्चा | रु | त | या | प्र | वि | ष्टाम् |
| नि | त | म्बि | नी | मि | च्छ | सि | मु | क्त | ल | ज्जां |
| क | ण्ठे | स्व | यं | ग्रा | ह | नि | ष | क्त | बा | हुम् |
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