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उमापि नीलालकमध्यशोभि
विस्रंसयन्ती नवकर्णिकारम् ।
चकार कर्णच्युतपल्लवेन
मूर्ध्ना प्रणामं वृषभध्वजाय ॥

अन्वयः AI उमा अपि नील-अलक-मध्य-शोभि नव-कर्णिकारम् विस्रंसयन्ती, कर्ण-च्युत-पल्लवेन मूर्ध्ना वृषभ-ध्वजाय प्रणामम् चकार ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) उमेति । उमापि नीलालकानां मध्ये शौभत इति तथोक्तम् । अलकन्यस्तमित्यर्थः । नवकर्णिकारं विस्रंसयन्ती कर्णाच्च्युतः पल्लवो यस्य तेन मूर्ध्ना वृषभध्वजाय प्रणामं चकार । क्रियाग्रहणात्संप्रदानत्वम्
Summary AI Uma too, letting the fresh Karnikara flower that shone amidst her dark curls slip, made a bow to the bull-bannered god with her head, from which the leafy ear-ornament had also fallen.
सारांश AI उमा ने भी नीले बालों के बीच सुशोभित नवीन कर्णिकार पुष्प को हटाते हुए, मस्तक झुकाकर वृषभध्वज शिव को प्रणाम किया, जिससे उनके कान का पल्लव गिर गया।
पदच्छेदः AI
उमाउमा (१.१) Uma
अपिअपि also
नीलालकमध्यशोभिनीलअलकमध्यशोभिन् shining amidst the dark curls
विस्रंसयन्तीविस्रंसयन्ती (वि√स्रंस्+णिच्+शत्रृ, १.१) letting slip
नवकर्णिकारम्नवकर्णिकार (२.१) the fresh Karnikara flower
चकारचकार (√कृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) made
कर्णच्युतपल्लवेनकर्णच्युत (√च्यु+क्त)पल्लव (३.१) with the leafy ear-ornament having fallen
मूर्ध्नामूर्धन् (३.१) with her head
प्रणामम्प्रणाम (२.१) a bow
वृषभध्वजायवृषभध्वज (४.१) to the bull-bannered one (Shiva)
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
मा पि नी ला ध्य शो भि
वि स्रं न्ती र्णि का रम्
का र्ण च्यु ल्ल वे
मू र्ध्ना प्र णा मं वृ ध्व जा
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