तस्मै शशंस प्रणिपत्य नन्दी
शुश्रूषया शैलसुतामुपेताम् ।
प्रवेशयामास च भर्तुरेनां
भ्रूक्षेपमात्रानुमतप्रवेशाम् ॥

अन्वयः AI नन्दी प्रणिपत्य शुश्रूषया उपेताम् शैल-सुताम् तस्मै शशंस । च भ्रू-क्षेप-मात्र-अनुमत-प्रवेशाम् एनाम् भर्तुः (सकाशम्) प्रवेशयामास ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) तस्मा इति । अथ नन्दी तस्मै भगवते । क्रियाग्रहणाच्चतुर्थी । प्रणिपत्य नमस्कृत्य शुश्रूषया सेवया निमित्तेनोपेताम् । सेवार्थमागतामित्यर्थः । शैलसुतां शशंस निवेदयामास । भर्तुः स्वामिनो भ्रूक्षेपमात्रेण भ्रूसंज्ञयैवानुमतप्रवेशामङ्गीकृतप्रवेशामेनां शैलसुतां प्रवेशायामास च
Summary AI Having bowed, Nandi announced to him (Shiva) the arrival of the mountain's daughter, who had come with a desire to serve. And he ushered her, whose entry was permitted by a mere movement of her master's brow, into his presence.
सारांश AI नंदी ने प्रणाम करके शिव को सूचित किया कि पार्वती उनकी सेवा के लिए उपस्थित हैं। शिव ने अपनी भौंहों के संकेत मात्र से उन्हें प्रवेश की अनुमति प्रदान की।
पदच्छेदः AI
तस्मैतद् (४.१) to him
शशंसशशंस (√शंस कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) announced
प्रणिपत्यप्रणिपत्य (प्र+नि√पत्+ल्यप्) having bowed
नन्दीनन्दिन् (१.१) Nandi
शुश्रूषयाशुश्रूषा (३.१) with a desire to serve
शैलसुताम्शैलसुता (२.१) the mountain's daughter
उपेताम्उपेता (उप√इ+क्त, २.१) arrived
प्रवेशयामासप्रवेशयामास (प्र√विश् +णिच्+आम् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) ushered in
and
भर्तुःभर्तृ (६.१) of the master
एनाम्एतद् (२.१) her
भ्रूक्षेपमात्रानुमतप्रवेशाम्भ्रूक्षेपमात्रअनुमत (अनु√मन्+क्त)प्रवेश (२.१) whose entry was permitted by a mere movement of the brow
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
स्मै शं प्र णि त्य न्दी
शु श्रू या शै सु ता मु पे ताम्
प्र वे या मा र्तु रे नां
भ्रू क्षे मा त्रा नु प्र वे शाम्
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