अशोकनिर्भर्त्सितपद्मराग-
माकृष्टहेमद्युतिकर्णिकारम् ।
मुक्ताकलापीकृतसिन्दुवारं
वसन्तपुष्पाभरणं वहन्ती ॥
अशोकनिर्भर्त्सितपद्मराग-
माकृष्टहेमद्युतिकर्णिकारम् ।
मुक्ताकलापीकृतसिन्दुवारं
वसन्तपुष्पाभरणं वहन्ती ॥
माकृष्टहेमद्युतिकर्णिकारम् ।
मुक्ताकलापीकृतसिन्दुवारं
वसन्तपुष्पाभरणं वहन्ती ॥
अन्वयः
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अशोक-निर्भर्त्सित-पद्म-रागम्, आकृष्ट-हेम-द्युति-कर्णिकारम्, मुक्ता-कलापी-कृत-सिन्दुवारम् वसन्त-पुष्प-आभरणम् वहन्ती (सा अदृश्यत) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अशोकेति । अशोकपुष्पेण निर्भर्त्सितास्तिरस्कृताः पद्मरागा येन तत्तथोक्तम् । आकृष्टहेमद्युतीन्याहृतस्वर्णाभरणवर्णानि कर्णिकाराणि यर्स्मिस्तत् तथोक्तम् । मुक्ताकलापीकृतानि सिन्धुवाराणि निगुण्डीकुसुमानि यस्मिंस्तत् । `सिन्धुवारेन्द्रसुरसौ निर्गुण्डीन्द्राणिकेत्यपि` इत्यमरः । वसन्तपुष्पाण्येवाभरणं वहन्ती
Summary
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She was wearing an ornament of spring flowers, in which Ashoka blossoms surpassed the redness of rubies, Karnikara flowers outshone the brilliance of gold, and Sindhuvara flowers served as pearl necklaces.
सारांश
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उन्होंने अशोक, कनेर और सिन्दुवार के फूलों के आभूषण पहने थे, जो क्रमशः मणियों, सोने और मोतियों की चमक तथा सुंदरता को भी मात दे रहे थे।
पदच्छेदः
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| अशोकनिर्भर्त्सितपद्मरागम् | अशोक–निर्भर्त्सित (निर्√भर्त्स्+क्त)–पद्म–राग (२.१) | in which Ashoka flowers surpassed the color of rubies |
| आकृष्टहेमद्युतिकर्णिकारम् | आकृष्ट (आ√कृष्+क्त)–हेम–द्युति–कर्णिकार (२.१) | in which Karnikara flowers outshone the brilliance of gold |
| मुक्ताकलापीकृतसिन्दुवारम् | मुक्ता–कलापी–कृत (√कृ+क्त)–सिन्दुवार (२.१) | in which Sindhuvara flowers were made into pearl necklaces |
| वसन्तपुष्पाभरणम् | वसन्त–पुष्प–आभरण (२.१) | an ornament of spring flowers |
| वहन्ती | वहन्ती (√वह्+शत्रृ, १.१) | wearing |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | शो | क | नि | र्भ | र्त्सि | त | प | द्म | रा | ग |
| मा | कृ | ष्ट | हे | म | द्यु | ति | क | र्णि | का | रम् |
| मु | क्ता | क | ला | पी | कृ | त | सि | न्दु | वा | रं |
| व | स | न्त | पु | ष्पा | भ | र | णं | व | ह | न्ती |
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