भुजंगमोन्नद्धजटाकलापं
कर्णावसक्तद्विगुणाक्षसूत्रम् ।
कण्ठप्रभासङ्गविशेषनीलां
कृष्णत्वचं ग्रन्थिमतीं दधानम् ॥

अन्वयः AI भुजंगम-उन्नद्ध-जटा-कलापम्, कर्ण-अवसक्त-द्वि-गुण-अक्ष-सूत्रम्, कण्ठ-प्रभा-सङ्ग-विशेष-नीलाम् ग्रन्थि-मतीम् कृष्ण-त्वचम् दधानम् त्र्यम्बकम् ददर्श ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) भुजंगमेति ॥ बुजंगमोन्नद्ध उन्नमय्य बद्धो जटाकलापो येन तं तथोक्तम् । कर्णावसक्तम् । कर्णावलम्बीत्यर्थः । अत एव द्विगुणं द्विरावृत्तमक्षसूत्रमक्षमाला यस्य तं कण्ठप्रभाणां सङ्गेन मिश्रणेन विशेषनीलामतिनीलां ग्रन्थिमतीं बन्धनयुक्तां कृष्णत्वचं कृष्णमृगाजिनं दधानम्
Summary AI (He saw Shiva) who had a mass of matted hair tied up with a serpent, a rosary of Rudraksha beads looped twice over his ear, and was wearing a knotted black deerskin, which appeared even darker where it touched the radiance of his throat.
सारांश AI उनकी जटाएँ सर्पों से बँधी थीं, कानों में रुद्राक्ष की मालाएँ थीं और वे गले की नीली आभा से रंजित, गांठों वाले काले मृगचर्म को धारण किए हुए थे।
पदच्छेदः AI
भुजंगमोन्नद्धजटाकलापम्भुजंगमउन्नद्ध (उत्√नह्+क्त)जटाकलाप (२.१) who had a mass of matted hair tied up with a serpent
कर्णावसक्तद्विगुणाक्षसूत्रम्कर्णअवसक्त (अव√सञ्ज्+क्त)द्विगुणअक्षसूत्र (२.१) who had a rosary looped twice over his ear
कण्ठप्रभासङ्गविशेषनीलाम्कण्ठप्रभासङ्गविशेषनील (२.१) which was especially dark from contact with the radiance of his throat
कृष्णत्वचम्कृष्णत्वच् (२.१) a black deerskin
ग्रन्थिमतीम्ग्रन्थिमत् (२.१) knotted
दधानम्दधान (√धा+शानच्, २.१) wearing
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
भु जं मो न्न द्ध टा ला पं
र्णा क्त द्वि गु णा क्ष सू त्रम्
ण्ठ प्र भा ङ्ग वि शे नी लां
कृ ष्ण त्व चं ग्र न्थि तीं धा नम्
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