लग्नद्विरेफाञ्जनभक्तिचित्र-
म्मुखे मधुश्रीस्तिलकं प्रकाश्य ।
रागेण बालारुणकोमलेन
चूतप्रवालोष्ठमलंचकार ॥

अन्वयः AI मधु-श्रीः मुखे लग्न-द्विरेफ-अञ्जन-भक्ति-चित्रम् तिलकम् प्रकाश्य, बाल-अरुण-कोमलेन रागेण चूत-प्रवाल-ओष्ठम् अलंचकार ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) लग्नेति । मधुश्रीवंसन्तलक्ष्मीर्लग्नद्विरेफा एवाञ्जनभक्तयः कज्जलरचनास्ताभिश्चित्रं चित्रवर्णं तिलकं पुष्पविशेषमेव तिलकं विशेषकम् । मुखं प्रारम्भस्तस्मिन्नेव मुखे वक्त्रे प्रकाश्य प्रकटय्य बालारुणकोमलेन बालार्कसुन्दरेण रागेणारुणिम्ना तेनेव लाक्षारागेण चूतप्रवाल एवौष्ठस्तं चूतप्रवालोष्ठमलंचकार प्रसाधयामास । अत्र रुपकालंकारः
Summary AI The Goddess of Spring (Madhu-shri), having displayed on her face a Tilaka mark made picturesque by the decorative lines of bees clinging to it like kohl, adorned her mango-shoot lips with a redness as tender as the morning sun.
सारांश AI वसंत-लक्ष्मी ने तिलक पुष्प पर काजल रूपी भौंरों से माथे पर तिलक लगाया और बाल सूर्य के समान लाल आम की नई कोंपलों से अपने होठों को सजाया।
पदच्छेदः AI
लग्नद्विरेफाञ्जनभक्तिचित्रम्लग्न (√लग्+क्त)द्विरेफअञ्जनभक्तिचित्र (२.१) picturesque with the decorative lines of clinging bees like kohl
मुखेमुख (७.१) on her face
मधुश्रीःमधुश्री (१.१) the Goddess of Spring
तिलकम्तिलक (२.१) a tilaka mark
प्रकाश्यप्रकाश्य (प्र√काश्+ल्यप्) having displayed
रागेणराग (३.१) with a redness
बालारुणकोमलेनबालअरुणकोमल (३.१) as tender as the morning sun
चूतप्रवालोष्ठम्चूतप्रवालओष्ठ (२.१) the mango-shoot lips
अलंचकारअलंचकार (अलम्√कृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) adorned
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
ग्न द्वि रे फा ञ्ज क्ति चि त्र
म्मु खे धु श्री स्ति कं प्र का श्य
रा गे बा ला रु को ले
चू प्र वा लो ष्ठ लं का
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