वर्णप्रकर्षे सति कर्णिकारं
दुनोति निर्गन्धतया स्म चेतः ।
प्रायेण सामग्र्यविधौ गुणानां
पराङ्मुखी विश्वसृजः प्रवृत्तिः ॥
वर्णप्रकर्षे सति कर्णिकारं
दुनोति निर्गन्धतया स्म चेतः ।
प्रायेण सामग्र्यविधौ गुणानां
पराङ्मुखी विश्वसृजः प्रवृत्तिः ॥
दुनोति निर्गन्धतया स्म चेतः ।
प्रायेण सामग्र्यविधौ गुणानां
पराङ्मुखी विश्वसृजः प्रवृत्तिः ॥
अन्वयः
AI
कर्णिकारम् वर्ण-प्रकर्षे सति अपि निर्गन्धतया चेतः दुनोति स्म । प्रायेण गुणानाम् सामग्री-विधौ विश्व-सृजः प्रवृत्तिः पराङ्मुखी भवति ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
वर्णेति । कर्णिकारं कर्णिकारकुसुमम् । `अवयवे च प्राण्योषधिवृक्षेभ्यः` (अष्टाध्यायी ४.३.१३५ ) इत्युत्पन्नस्य तद्धितस्य `पुष्पमूलेषु बहुलम्` इति लुक् । एवमन्यत्रापि द्रष्टव्यम् । वर्णप्रकर्षे वर्णोत्कर्षे सत्यपि निर्गन्धतया हेतुना चेतो दुनोति स्म पर्यतापयत् । `लट् स्मे` (अष्टाध्यायी ३.२.११८ ) इति भूतार्थे लट् । तथाहि । प्रायेण विश्वसृजो विधातुः प्रवृत्तिर्गुणानां सामग्र्यविधौ साकल्यसंपादनविषये पराङ्मुखी । सर्वत्रापि वस्तुनि र्किचिद्वैकल्यं संपादयति । यथा चन्द्रे कलङ्कः । अतः कर्णिकारेऽपि नैर्गन्ध्यं युज्यत इति भावः । सामान्येन विशेषसमर्थनरुपोऽर्थान्तरन्यासोऽलंकारः
Summary
AI
Despite its splendid color, the Karnikara flower pained the heart with its lack of fragrance. Indeed, in the matter of assembling all qualities together, the Creator's disposition is often averse.
सारांश
AI
कनेर का फूल अपने अत्यंत सुंदर रंग के बावजूद गंधहीन होने के कारण मन को खटक रहा था। प्रायः विधाता की सृष्टि में सभी गुणों का एक साथ मिलना दुर्लभ होता है।
पदच्छेदः
AI
| वर्णप्रकर्षे | वर्ण–प्रकर्ष (७.१) | in excellence of color |
| सति | सत् (√अस्+शतृ, ७.१) | being present |
| कर्णिकारम् | कर्णिकार (२.१) | the Karnikara flower |
| दुनोति | दुनोति (√दु कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | pains |
| निर्गन्धतया | निर्गन्धता (३.१) | by its lack of fragrance |
| स्म | स्म | (makes past tense) |
| चेतः | चेतस् (२.१) | the heart |
| प्रायेण | प्रायेण | generally |
| सामग्र्यविधौ | सामग्री–विधि (७.१) | in the matter of providing a complete set |
| गुणानाम् | गुण (६.३) | of qualities |
| पराङ्मुखी | पराङ्मुख (१.१) | averse |
| विश्वसृजः | विश्वसृज् (६.१) | of the Creator |
| प्रवृत्तिः | प्रवृत्ति (१.१) | the disposition |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व | र्ण | प्र | क | र्षे | स | ति | क | र्णि | का | रं |
| दु | नो | ति | नि | र्ग | न्ध | त | या | स्म | चे | तः |
| प्रा | ये | ण | सा | म | ग्र्य | वि | धौ | गु | णा | नां |
| प | रा | ङ्मु | खी | वि | श्व | सृ | जः | प्र | वृ | त्तिः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.