तद्गच्छ सिद्ध्यै कुरु देवकार्य-
मर्थोऽयमर्थान्तरभाव्य एव ।
अपेक्षते प्रत्ययमुत्तमं त्वां
बीजाङ्कुरः प्रागुदयादिवाम्भः ॥
तद्गच्छ सिद्ध्यै कुरु देवकार्य-
मर्थोऽयमर्थान्तरभाव्य एव ।
अपेक्षते प्रत्ययमुत्तमं त्वां
बीजाङ्कुरः प्रागुदयादिवाम्भः ॥
मर्थोऽयमर्थान्तरभाव्य एव ।
अपेक्षते प्रत्ययमुत्तमं त्वां
बीजाङ्कुरः प्रागुदयादिवाम्भः ॥
अन्वयः
AI
तत् सिद्ध्यै गच्छ, देवकार्यम् कुरु। अयम् अर्थः अर्थान्तरभाव्यः एव। सः प्राक् उदयात् बीजाङ्कुरः अम्भः इव, उत्तमम् प्रत्ययम् त्वाम् अपेक्षते।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तदिति ॥ तत्तस्मात्सिद्ध्यै कार्यसिद्ध्यर्थं गच्छ । देवकार्यं कुरु । आशिषि लोट् । अयमर्थः प्रयोजनमर्थान्तरभाव्यः कारणान्तरसाध्य एव । तच्च कारणान्तरं पार्वतीसंनिधानमिति भावः । `अर्थः प्रकारे विषये वित्तकारणवस्तुषु । अभिधेये च शब्दानां वृत्तौ चापि प्रयोजने ।` इति विश्वः । तथापि बीजसाध्योऽङ्कुरो बीजाङ्कुर उदयादुत्पतेः प्रागम्भ इव त्वामुत्तमं प्रत्ययं चरमं कारणमपेक्षते । `प्रत्ययोऽधीनशपथज्ञानविश्वासहेतुषु` इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१५६ ) । तस्मादस्मिन्नर्थे तव चरमसहकारित्वादनन्यसाध्योऽयमर्थ इति भावः
Summary
AI
"Therefore, go for success and do the gods' work. This matter depends entirely on another cause (you). It awaits you, the best instrument, just as a sprout within a seed, before its emergence, awaits water."
सारांश
AI
अतः सिद्धि के लिए जाओ और देवकार्य संपन्न करो। यह कार्य तुम्हारे बिना संभव नहीं है, जैसे बीज का अंकुरण जल की अपेक्षा करता है।
पदच्छेदः
AI
| तत् | तत् | therefore |
| गच्छ | गच्छ (√गम् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | go |
| सिद्ध्यै | सिद्धि (४.१) | for success |
| कुरु | कुरु (√कृ कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | do |
| देवकार्यम् | देव–कार्य (२.१) | the work of the gods |
| अर्थः | अर्थ (१.१) | purpose |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| अर्थान्तरभाव्यः | अर्थ–अन्तर–भाव्य (१.१) | dependent on another cause |
| एव | एव | only |
| अपेक्षते | अपेक्षते (अप√ईक्ष् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | awaits |
| प्रत्ययम् | प्रत्यय (२.१) | cause |
| उत्तमम् | उत्तम (२.१) | the best |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| बीजाङ्कुरः | बीज–अङ्कुर (१.१) | the sprout from a seed |
| प्राक् | प्राच् | before |
| उदयात् | उदय (५.१) | its emergence |
| इव | इव | like |
| अम्भः | अम्भस् (२.१) | water |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | द्ग | च्छ | सि | द्ध्यै | कु | रु | दे | व | का | र्य |
| म | र्थो | ऽय | म | र्था | न्त | र | भा | व्य | ए | व |
| अ | पे | क्ष | ते | प्र | त्य | य | मु | त्त | मं | त्वां |
| बी | जा | ङ्कु | रः | प्रा | गु | द | या | दि | वा | म्भः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.