अथ स ललितयोषिद्भ्रूलताचारुशृङ्गं
रतिवलयपदाङ्के चापमासज्य कण्ठे ।
सहचरमधुहस्तन्यस्तचूताङ्कुरास्त्रः
शतमखमुपतस्थे प्राञ्जलिः पुष्पधन्वा ॥
अथ स ललितयोषिद्भ्रूलताचारुशृङ्गं
रतिवलयपदाङ्के चापमासज्य कण्ठे ।
सहचरमधुहस्तन्यस्तचूताङ्कुरास्त्रः
शतमखमुपतस्थे प्राञ्जलिः पुष्पधन्वा ॥
रतिवलयपदाङ्के चापमासज्य कण्ठे ।
सहचरमधुहस्तन्यस्तचूताङ्कुरास्त्रः
शतमखमुपतस्थे प्राञ्जलिः पुष्पधन्वा ॥
अन्वयः
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अथ सः पुष्पधन्वा ललितयोषित्भ्रूलताचारुशृङ्गम् चापम् रतिवलयपदाङ्के कण्ठे आसज्य, सहचरमधुहस्तन्यस्तचूताङ्कुरास्त्रः सन्, प्राञ्जलिः सन् शतमखम् उपतस्थे।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अथेति । अथ स्मरणानन्तरम् । स स्मृत इत्यर्थः । पुष्पं धनुर्यस्य स पुष्पधन्वा कामः । `वा संज्ञायाम्` (अष्टाध्यायी ५.४.१३३ ) इत्यनङ् । `ललितं त्रिषु सुन्दरम्` इत्मरः । ललितायाः सुन्दर्या योषितो भ्रुवौ लते इव चारुणी श्रृङ्गे कोटी यस्य तत्तथोक्तं चापम् । रतिः स्मरप्रिया । रतिः स्मरप्रिया` इत्यमरः । तस्या वलयपदानि कङ्कणस्थानान्यङ्कश्चिह्नं यस्य स तथोक्ते कण्ठ आसज्य लगयित्वा । चापकण्ठविशेषणाभ्यां श्रृङ्गारैकनिधेस्त्रिभुवनैकवीरस्य श्रृङ्गारवीरोपकरणेषु तुल्यरसत्वं व्यज्यते । सहचरस्य सख्युर्मधोर्वसन्तस्य हस्ते न्यस्तं चूताङ्कुरमेवास्त्रं यस्य स तथोक्तः प्राञ्जलिः सन् । शतमखमिन्द्रमुपतस्थे सङ्गतवान् । सङ्गतिकरणार्थादात्मनेपदम् । अत्र स्वभावोक्तिः `ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलाकैः` इति लक्षणात्
Summary
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Then Kamadeva, the one with the flowery bow, approached Indra. He had slung on his shoulder his bow, whose beautiful tips resembled the eyebrows of charming women, and his mango-shoot arrows were held by his companion, Spring. He stood with folded hands.
सारांश
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सुंदर स्त्रियों की भौंहों के समान मनोहर और रति के कंकणों के चिन्हों वाले धनुष को गले में डालकर, सखा वसंत के हाथों में आम के बौर रूपी बाण थमाकर, कामदेव हाथ जोड़कर इंद्र के समक्ष उपस्थित हुए।
पदच्छेदः
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| अथ | अथ | then |
| सः | तद् (१.१) | he |
| ललितयोषिद्भ्रूलताचारुशृङ्गम् | ललित–योषित्–भ्रूलता–चारु–शृङ्ग (२.१) | whose beautiful tips resembled the creeper-like eyebrows of charming women |
| रतिवलयपदाङ्के | रति–वलय–पद–अङ्क (७.१) | marked with the imprints of Rati's bracelets |
| चापम् | चाप (२.१) | the bow |
| आसज्य | आसज्य (आ√सञ्ज्+ल्यप्) | having slung |
| कण्ठे | कण्ठ (७.१) | on his shoulder |
| सहचरमधुहस्तन्यस्तचूताङ्कुरास्त्रः | सहचर–मधु–हस्त–न्यस्त–चूत–अङ्कुर–अस्त्र (१.१) | he whose mango-shoot arrows were placed in the hands of his companion, Spring |
| शतमखम् | शतमख (२.१) | to Indra |
| उपतस्थे | उपतस्थे (उप√स्था कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | approached |
| प्राञ्जलिः | प्राञ्जलि (१.१) | with folded hands |
| पुष्पधन्वा | पुष्प–धन्वन् (१.१) | the one with the flowery bow (Kamadeva) |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | स | ल | लि | त | यो | षि | द्भ्रू | ल | ता | चा | रु | शृ | ङ्गं |
| र | ति | व | ल | य | प | दा | ङ्के | चा | प | मा | स | ज्य | क | ण्ठे |
| स | ह | च | र | म | धु | ह | स्त | न्य | स्त | चू | ता | ङ्कु | रा | स्त्रः |
| श | त | म | ख | मु | प | त | स्थे | प्रा | ञ्ज | लिः | पु | ष्प | ध | न्वा |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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