अन्वयः
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नीललोहितरेतसः निषिक्तस्य अंशात् ऋते, संयुगे उद्यतं सांयुगीनं तं कः प्रसहेत?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
संयुग इति ॥ संयुगे युद्ध उद्यन्तं व्याप्रियमाणम् । संयुगे साधुं सांयुगीनम् । `प्रतिजनादिभ्यः खञ्` (अष्टाध्यायी ४.४.९९ ) इति खञ्प्रत्ययः । तं तारकं निषिक्तस्य क्वचित्क्षेत्रे क्षरितस्य । `नीलः कण्ठे लोहितश्च केशेष्विति नीललोहित इति पुराणम् ।` इति स्वामी । तस्य नीललोहितस्य धूर्जटेरेतसः शुक्रस्यांशादृतेंऽशं विनान्यः कः प्रसहेताभिभवेत् । प्रसहनमभिभवः` इति वृत्तिकारः
Summary
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"Who can withstand that warrior when he is ready for battle, except for an offspring created from a part of the seed of the Blue-and-Red one (Shiva)?"
सारांश
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रणकुशल उस असुर का युद्ध में भगवान शिव के अंश से उत्पन्न पुत्र के अतिरिक्त अन्य कोई सामना नहीं कर सकता।
पदच्छेदः
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| संयुगे | संयुग (७.१) | In battle, |
| सांयुगीनम् | सांयुगीन (२.१) | the warrior |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| उद्यतम् | उद्यत (उद्√यम्+क्त, २.१) | ready, |
| प्रसहेत | प्रसहेत (प्र√सह् कर्तरि विधिलिङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | can withstand? |
| कः | किम् (१.१) | Who |
| अंशात् | अंश (५.१) | from a part |
| ऋते | ऋते | except |
| निषिक्तस्य | निषिक्त (नि√सिच्+क्त, ६.१) | infused |
| नीललोहितरेतसः | नीललोहित–रेतस् (६.१) | from the seed of the Blue-and-Red one (Shiva). |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | यु | गे | सां | यु | गी | नं | त |
| मु | द्य | तं | प्र | स | हे | त | कः |
| अं | शा | दृ | ते | नि | षि | क्त | स्य |
| नी | ल | लो | हि | त | रे | त | सः |
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