अन्वयः
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यं सुरसैन्यानां गोप्तारं पुरस्कृत्य गोत्रभित् शत्रुभ्यः जयश्रियं बन्दीम् इव प्रत्यानेष्यति।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
गोप्तारमिति ॥ सुरसैन्यानां देवतासेनानां गोप्तारं रक्षितारं यं सेनान्यं पुरस्कृत्य पुरोधाय । `पुरोऽव्ययम्` इति गतित्वात् `नमस्पुरसोर्गत्योः` (अष्टाध्यायी ८.३.४० ) इति सकारः । गां पृथ्वीं त्रायन्त इति गोत्रास्तान्भिनत्तीति गोत्रभिदिन्द्रो जयश्रियं बन्दीमिव बन्दीकृतां स्त्रियमिव शत्रुभ्यः सकाशात्प्रत्यानेष्यति प्रत्याहरिष्यति तं स्त्रष्टुमिति पूर्वेण संबन्धः
Summary
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We desire a protector of the divine armies, by placing whom at the forefront, Indra (the smasher of mountains) will bring back the goddess of victory from the enemies, as if rescuing a captive woman.
सारांश
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हम देवसेना का ऐसा रक्षक चाहते हैं जिसकी सहायता से इंद्र शत्रुओं से अपनी विजयलक्ष्मी को बंदी स्त्री की तरह वापस ला सकें।
पदच्छेदः
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| गोप्तारम् | गोप्तृ (√गुप्+तृच्, २.१) | a protector |
| सुरसैन्यानाम् | सुर–सैन्य (६.३) | of the divine armies, |
| यम् | यद् (२.१) | whom |
| पुरस्कृत्य | पुरस्कृत्य (पुरस्√कृ+ल्यप्) | having placed at the forefront, |
| गोत्रभित् | गोत्रभिद् (१.१) | the smasher of mountains (Indra) |
| प्रत्यानेष्यति | प्रत्यानेष्यति (प्रति+आ√नी कर्तरि लृट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | will bring back |
| शत्रुभ्यः | शत्रु (५.३) | from the enemies |
| बन्दीम् | बन्दी (२.१) | a captive woman |
| इव | इव | like |
| जयश्रियम् | जय–श्री (२.१) | the goddess of victory. |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| गो | प्ता | रं | सु | र | सै | न्या | नां |
| यं | पु | र | स्कृ | त्य | गो | त्र | भित् |
| प्र | त्या | ने | ष्य | ति | श | त्रु | भ्यो |
| ब | न्दी | मि | व | ज | य | श्रि | यम् |
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