अन्वयः
AI
सरितां पतिः तस्य उपायनयोग्यानि रत्नानि अम्भसाम् अन्तरा निष्पत्तेः कथम् अपि प्रतीक्षते।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तस्येति ॥ सरितां पतिः समुद्रस्तस्य तारकस्योपायनानां प्राभृतानां योग्यानि । `प्राभृतं तु प्रदेशनम् । उपायनम्` इत्यमरः । रत्नान्यम्भसामन्तरा निष्पत्तेः परिपाकपर्यन्तम् । विकल्पादसमासः । कथमपि महता यत्नेन प्रतीक्षते । कदा वा परिपच्येरन्नित्येकाग्रेण पालयतीत्यर्थः
Summary
AI
The lord of the rivers, the ocean, with great difficulty waits for the formation of gems within its waters, considering them worthy to be presented as gifts to him (Tarakasura).
सारांश
AI
समुद्र उसे भेंट देने योग्य रत्नों के जल के भीतर परिपक्व होने की प्रतीक्षा करता है ताकि वह उसे उपहार स्वरूप दे सके।
पदच्छेदः
AI
| तस्य | तद् (६.१) | for him |
| उपायनयोग्यानि | उपायन–योग्य (२.३) | worthy as gifts |
| रत्नानि | रत्न (२.३) | gems |
| सरितां | सरित् (६.३) | of the rivers |
| पतिः | पति (१.१) | the lord (ocean) |
| कथम् | कथम् | somehow |
| अपि | अपि | even |
| अम्भसाम् | अम्भस् (६.३) | of the waters |
| अन्तरा | अन्तरा | within |
| निष्पत्तेः | निष्पत्ति (निस्√पद्+क्तिन्, ५.१) | for the formation |
| प्रतीक्षते | प्रतीक्षते (प्रति√ईक्ष् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | waits. |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | स्यो | पा | य | न | यो | ग्या | नि |
| र | त्ना | नि | स | रि | तां | प | तिः |
| क | थ | म | प्य | म्भ | सा | म | न्त |
| रा | नि | ष्प | त्तेः | प्र | ती | क्ष | ते |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.