अन्वयः
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उद्याने कुसुम-स्तेय-साध्वसात् व्यावृत्त-गतिः वायुः तत्-पार्श्वे ताल-वृन्त-अनिल-अधिकम् न वाति ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
व्यावृत्तेति ॥ वायुः स्तेनस्य भावः कर्म वा स्तेयं चौर्यम् । `स्तेनाद्यन्नलोपश्च` (अष्टाध्यायी ५.१.१२५ ) इति यत्प्रत्ययो नलोपश्च । कुसुमानां स्तेयं तस्मात्स्तेयाभियोगाद्दण्डाद्वा साध्वसं भयं तस्माद्धेतोरुद्याने व्यावृत्तगतिः । निवृत्तोद्यानसंचारः सन्नित्यर्थः । सापेक्षत्वेऽपि गमकत्वात् समासः । तत्पार्श्वे तत्समीपे । तालस्य वृन्तैरुद्ग्रन्थ्यते । तालस्येव वृन्तमस्येति वा तालवृन्तं तस्यानिलाद्व्यजनसंचारपवनादधिकं यथा तथा न वाति । `व्यजनं तालवृन्तकम्` इत्यमरः
Summary
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"In his gardens, the wind, its movement checked for fear of stealing flowers, does not blow near him with more force than the gentle breeze from a palm-leaf fan." Even the wind dares not disturb Taraka's pleasure gardens.
सारांश
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वायु उस असुर के उद्यान में पुष्पों की चोरी के भय से अपनी गति मन्द करके केवल पंखे की हवा के समान बहती है।
पदच्छेदः
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| व्यावृत्तगतिः | व्यावृत्त (वि+आ√वृत्+क्त)–गति (१.१) | whose movement is checked |
| उद्याने | उद्यान (७.१) | in the gardens |
| कुसुमस्तेयसाध्वसात् | कुसुम–स्तेय–साध्वस (५.१) | from the fear of stealing flowers |
| न | न | not |
| वाति | वाति (√वा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | blows |
| वायुः | वायु (१.१) | the wind |
| तत्पार्श्वे | तद्–पार्श्व (७.१) | near him |
| तालवृन्तानिलाधिकम् | ताल–वृन्त–अनिल–अधिकम् (२.१) | more than the breeze from a palm-leaf fan |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व्या | वृ | त्त | ग | ति | रु | द्या | ने |
| कु | सु | म | स्ते | य | सा | ध्व | सात् |
| न | वा | ति | वा | यु | स्त | त्पा | र्श्वे |
| ता | ल | वृ | न्ता | नि | ला | धि | कम् |
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