अन्वयः
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चन्द्रः सर्वदा सर्वाभिः कलाभिः तम् निषेवते । केवलाम् हर-चूडामणि-कृताम् लेखाम् न आदत्ते ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
सर्वाभिरिति ॥ चन्द्रस्तं तारकं सर्वदा । कृष्णपक्षेऽपीत्यर्थः । सर्वाभिः कलाभिर्निषेवते ।`कला तु षोडशो भागः` इत्यमरः (अमरकोशः १.३.१७ ) । केवलां हरचूडामणीकृतां शिवशिरोमणीकृतां लेखां नादत्ते न गृह्णाति
Summary
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"The moon always serves him (Taraka) with all its phases, meaning it is always full in his presence. It does not take on that single digit which is made the crest-jewel of Shiva."
सारांश
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चन्द्रमा अपनी समस्त कलाओं के साथ सदैव उसकी सेवा करता है और केवल उस कला को छोड़ देता है जो शिव के मस्तक का आभूषण है।
पदच्छेदः
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| सर्वाभिः | सर्व (३.३) | with all |
| सर्वदा | सर्वदा | always |
| चन्द्रः | चन्द्र (१.१) | the moon |
| तम् | तद् (२.१) | him (Taraka) |
| कलाभिः | कला (३.३) | with its digits |
| निषेवते | निषेवते (नि√सेव् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | serves |
| न | न | not |
| आदत्ते | आदत्ते (आ√दा कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | takes |
| केवलाम् | केवल (२.१) | only |
| लेखाम् | लेखा (२.१) | the digit |
| हरचूडामणीकृताम् | हर–चूडामणि–कृत (√कृ+क्त, २.१) | which is made the crest-jewel of Shiva |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | र्वा | भिः | स | र्व | दा | च | न्द्र |
| स्तं | क | ला | भि | र्नि | षे | व | ते |
| ना | द | त्ते | के | व | लां | ले | खां |
| ह | र | चू | डा | म | णी | कृ | ताम् |
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