अन्वयः
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सः द्वि-नेत्रः (अपि) हरेः सहस्र-नयन-अधिकम् चक्षुः वाचस्पतिः प्राञ्जलिः (सन्) जलज-आसनम् इदम् उवाच ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
स इति ॥ हरेरिन्द्रस्य। `इन्द्रो दुश्च्यवनो हरिः` इति हलायुधः । सहस्रान्नयनेभ्योऽधिकं सहस्रनयनाधिकम् । तदगोचरदर्शित्वादिति भावः । द्वे नेत्रे यस्य तद्द्विनेत्रम् । प्रसिद्धाच्चक्षुषोऽयं विशेष इत्यर्थः । चक्षुश्चक्षुर्भूतः । स च वाचस्पतिः । कस्कादित्वादलुक्सत्वे । `षष्ठ्याः पतिपुत्र-` इत्यादिना सत्वमिति स्वामी । तन्न, छन्दोविषयत्वात् । प्राञ्जलिः सन्। जलजासनं ब्रह्माणमिदमुवाच चक्षुष्ट्वारोपस्य प्रकृतोपयोगात्परिणामालङ्कारः
Summary
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That Lord of Speech (Brihaspati), though possessing only two eyes, had an eye of wisdom superior to Indra's thousand eyes. With folded hands, he spoke thus to the lotus-seated Brahma.
सारांश
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दो नेत्रों वाले उन बृहस्पति ने इन्द्र के हजार नेत्रों की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली वाणी में हाथ जोड़कर ब्रह्मा जी से यह कहा।
पदच्छेदः
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| सः | तद् (१.१) | he |
| द्विनेत्रः | द्वि–नेत्र (१.१) | having two eyes |
| हरेः | हरि (६.१) | than Indra's |
| चक्षुः | चक्षुस् (१.१) | eye (of knowledge) |
| सहस्रनयनाधिकम् | सहस्र–नयन–अधिकम् (२.१) | more than a thousand eyes |
| वाचस्पतिः | वाचस्–पति (१.१) | Brihaspati (Lord of Speech) |
| उवाच | उवाच (√वच् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | spoke |
| इदम् | इदम् (२.१) | this |
| प्राञ्जलिः | प्राञ्जलि (१.१) | with folded hands |
| जलजासनम् | जलज–आसन (२.१) | to the one seated on a lotus (Brahma) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | द्वि | ने | त्रो | ह | रे | श्च | क्षुः |
| स | ह | स्र | न | य | ना | धि | कम् |
| वा | च | स्प | ति | रु | वा | चे | दं |
| प्रा | ञ्ज | लि | र्ज | ल | जा | स | नम् |
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