अन्वयः
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पुराणस्य कवेः तस्य चतुर्मुख-समीरिता शब्दानाम् चतुष्टयी प्रवृत्तिः चरितार्था आसीत् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
पुराणस्येति ॥ द्रव्यगुणक्रियाजातिभेदेन चत्वारोऽवयवा यस्या इति चतुष्टयो चतुर्विधा । `संख्याया अवयवे तयप्` (अष्टाध्यायी ५.२.४२ ) इति तयप् । `टिङ्ढाणञ्द्वयसच्-` इत्यादिना ङीप् । शब्दानां प्रवृत्तिर्वैखरीप्रमुखा वाग्वृत्तिः । उक्तं च- `वैखरी शब्दनिष्पत्तिर्मध्यमा श्रुतिगोचरा । द्योतितार्था च पश्यन्ती सूक्ष्मा वागनपायिनी ॥` इति । पुराणास्य पुरातनस्य । पृषोदरादित्वात्साधुः । कवेः कवयितुस्तस्य ब्रह्मणश्चतुर्भिर्मुखैः समीरिता सती । `तद्धितार्थ-` इत्यादिनोत्तरपदसमासः । समाहारे चतुर्मुखीति स्यात् । चरितार्थान्वर्थासीत् । चतुर्मुखोच्चारणाच्चातुर्विध्यं सफलमासीदित्यर्थः
Summary
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The fourfold flow of words, uttered by that ancient seer with four faces (Brahma), was perfectly meaningful and fulfilled its purpose. This verse praises the quality of Brahma's speech.
सारांश
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उन पुरातन कवि ब्रह्मा के चारों मुखों से निकले हुए शब्द सार्थक हुए और उनकी वाणी की चारों वृत्तियाँ सफल हो गईं।
पदच्छेदः
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| पुराणस्य | पुराण (६.१) | of the ancient |
| कवेः | कवि (६.१) | of the poet/seer |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| चतुर्मुखसमीरिता | चतुर्मुख–समीरिता (सम्√ईर्+क्त, १.१) | uttered by the four-faced one |
| प्रवृत्तिः | प्रवृत्ति (प्र√वृत्, १.१) | the flow/usage |
| आसीत् | आसीत् (√अस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| शब्दानाम् | शब्द (६.३) | of words |
| चरितार्था | चरित–अर्थ (१.१) | fulfilled in its purpose |
| चतुष्टयी | चतुष्टयी (१.१) | fourfold |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पु | रा | ण | स्य | क | वे | स्त | स्य |
| च | तु | र्मु | ख | स | मी | रि | ता |
| प्र | वृ | त्ति | रा | सी | च्छ | ब्दा | नां |
| च | रि | ता | र्था | च | तु | ष्ट | यी |
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