प्रत्यर्थिभूतामपि तां समाधेः
शुश्रूषमाणां गिरिशोऽनुमेने ।
विकारहेतौ सति विक्रियन्ते
येषां न चेतांसि त एव धीराः ॥
प्रत्यर्थिभूतामपि तां समाधेः
शुश्रूषमाणां गिरिशोऽनुमेने ।
विकारहेतौ सति विक्रियन्ते
येषां न चेतांसि त एव धीराः ॥
शुश्रूषमाणां गिरिशोऽनुमेने ।
विकारहेतौ सति विक्रियन्ते
येषां न चेतांसि त एव धीराः ॥
अन्वयः
AI
गिरिशः समाधेः प्रत्यर्थिभूताम् अपि शुश्रूषमाणाम् ताम् अनुमेने। हि विकारहेतौ सति येषाम् चेतांसि न विक्रियन्ते, ते एव धीराः।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
प्रत्यर्थीति । गिरीशः शिवः समाधेः प्रत्यर्थिभूतां प्रतिपक्षभूतामपि । सुप्सुपेति समासः । श्रोतुमिच्छन्तीं शुश्रूषमाणां सेवमानाम् । सेवका हि सेव्ये दत्तकर्णा भवन्ति । इच्छार्थे सन्प्रत्ययः ।`ज्ञाश्रुस्मृदृशां सनः` (अष्टाध्यायी १.३.५७ ) इत्यात्मनेपदम् । तां पार्वतीमनुमेनेऽङ्गीचकार । न प्रतिषिद्धवानित्यभिप्रायः । न चैतावता धीरस्य कश्चिद्विकार इत्याशयः । धीरत्वमेवार्थान्तरन्यासेनाह- विकारेति । विकारस्य प्रकृतेरन्यथात्वस्य हेतौ स्त्रीसंनिधानादिकारणे सति विद्यमानेऽपि येषां चेतांसि न विक्रयन्ते न विकृर्ति नीयन्ते त एव धीराः । `विक्रियन्ते` इति कर्मणि लट्
Summary
AI
Shiva permitted her to serve him, even though she, who was desirous of serving, was a potential obstacle to his deep meditation. For, the truly steadfast are those whose minds are not disturbed even in the presence of a cause for agitation.
सारांश
AI
यद्यपि पार्वती तपस्या में विघ्न बन सकती थीं, फिर भी शिव ने उन्हें सेवा की अनुमति दी। वास्तविक धैर्यवान वही हैं जिनका मन कारण होने पर भी विचलित न हो।
पदच्छेदः
AI
| प्रत्यर्थिभूताम् | प्रत्यर्थिन्–भूत (२.१) | who was an obstacle |
| अपि | अपि | even though |
| ताम् | तद् (२.१) | her |
| समाधेः | समाधि (६.१) | to his meditation |
| शुश्रूषमाणाम् | शुश्रूषमाणा (√श्रु+सन्+शानच्, २.१) | desirous of serving |
| गिरिशः | गिरि–श (१.१) | Shiva |
| अनुमेने | अनुमेने (अनु√मन् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | permitted |
| विकारहेतौ | विकार–हेतु (७.१) | cause of disturbance |
| सति | सत् (√अस्+शतृ, ७.१) | when...exists |
| विक्रियन्ते | विक्रियन्ते (वि√कृ भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | are disturbed |
| येषाम् | यद् (६.३) | whose |
| न | न | not |
| चेतांसि | चेतस् (१.३) | minds |
| ते | तद् (१.३) | they |
| एव | एव | alone |
| धीराः | धीर (१.३) | the steadfast |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | त्य | र्थि | भू | ता | म | पि | तां | स | मा | धेः |
| शु | श्रू | ष | मा | णां | गि | रि | शो | ऽनु | मे | ने |
| वि | का | र | हे | तौ | स | ति | वि | क्रि | य | न्ते |
| ये | षां | न | चे | तां | सि | त | ए | व | धी | राः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.