चन्द्रं गता पद्मगुणान्न भुङ्क्ते
पद्माश्रिता चान्द्रमसीमभिख्याम् ।
उमामुखं तु प्रतिपद्य लोला
द्विसंश्रयां प्रीतिमवाप लक्ष्मीः ॥
चन्द्रं गता पद्मगुणान्न भुङ्क्ते
पद्माश्रिता चान्द्रमसीमभिख्याम् ।
उमामुखं तु प्रतिपद्य लोला
द्विसंश्रयां प्रीतिमवाप लक्ष्मीः ॥
पद्माश्रिता चान्द्रमसीमभिख्याम् ।
उमामुखं तु प्रतिपद्य लोला
द्विसंश्रयां प्रीतिमवाप लक्ष्मीः ॥
अन्वयः
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(लक्ष्मीः) चन्द्रं गता (सती) पद्मगुणान् न भुङ्क्ते, पद्माश्रिता (सती) चान्द्रमसीम् अभिख्यां (न भुङ्क्ते)। तु लोला लक्ष्मीः उमामुखं प्रतिपद्य द्विसंश्रयां प्रीतिम् अवाप।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
चन्द्रमिति ॥ लोला चपला । परिभ्रमणशीलेत्यर्थः । लक्ष्मीः कान्त्यभिमानिनी देवता चन्द्रं गता प्रात्पा सती पद्मगुणान्सौगन्ध्यादीन्न भुङ्क्ते नानुभवति । पद्माश्रिता सती चन्द्रमस इमां चान्द्रमसीमभिख्यां शोभाम् । `अभिख्या नामशोभयोः` इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१६४ ) । अमृतवदानन्दिनीं न भुङ्क्ते । उमामुखं प्रतिपद्य तु व्दे चन्द्रपद्मे संश्रयः कारणं यस्यास्तां द्विसंश्रयां प्रीतिमानन्दमवाप । तत्रोभयगुणसंभवादिति भावः । अत्रोपमानभूतचन्द्रपद्मापेक्षयोपमेयस्योमामुखस्याधिकगुणवत्त्वोक्त्या व्यतिरेकालंकारः । तदुक्तम्- `भेदप्राधान्येनोपमानादुपमेयस्याधिक्ये विपर्यये वा व्यतिरेकः` इति
Summary
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The goddess of beauty (Lakshmi), when in the moon, does not enjoy a lotus's qualities; when in a lotus, she lacks the moon's splendor. However, the fickle Lakshmi, upon reaching Umā's face, obtained the pleasure of both abodes at once.
सारांश
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लक्ष्मी चन्द्रमा के पास कमल की शोभा और कमल के पास चन्द्रमा की कान्ति खो देती है, किन्तु पार्वती के मुख में उसे इन दोनों का सौन्दर्य एक साथ प्राप्त हुआ।
पदच्छेदः
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| चन्द्रं | चन्द्र (२.१) | the moon |
| गता | गत (√गम्+क्त, १.१) | gone to |
| पद्मगुणान्न | पद्म–गुण (२.३)–न | not the qualities of a lotus |
| भुङ्क्ते | भुङ्क्ते (√भुज् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | enjoys |
| पद्माश्रिता | पद्म–आश्रित (आ√श्रि+क्त, १.१) | residing in a lotus |
| चान्द्रमसीमभिख्याम् | चान्द्रमसी (२.१)–अभिख्या (२.१) | the lunar splendor |
| उमामुखं | उमा–मुख (२.१) | Umā's face |
| तु | तु | but |
| प्रतिपद्य | प्रतिपद्य (प्रति√पद्+ल्यप्) | having reached |
| लोला | लोल (१.१) | the fickle |
| द्विसंश्रयां | द्वि–संश्रय (२.१) | of two abodes |
| प्रीतिम् | प्रीति (२.१) | the pleasure |
| अवाप | अवाप (अव√आप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | obtained |
| लक्ष्मीः | लक्ष्मी (१.१) | Lakshmi (goddess of beauty) |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| च | न्द्रं | ग | ता | प | द्म | गु | णा | न्न | भु | ङ्क्ते |
| प | द्मा | श्रि | ता | चा | न्द्र | म | सी | म | भि | ख्याम् |
| उ | मा | मु | खं | तु | प्र | ति | प | द्य | लो | ला |
| द्वि | सं | श्र | यां | प्री | ति | म | वा | प | ल | क्ष्मीः |
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