दिने दिने सा परिवर्धमाना
लब्धोदया चान्द्रमसीव लेखा ।
पुपोष लावण्यमयान्विशेषा-
ञ्ज्योत्स्नान्तराणीव कलान्तराणि ॥
दिने दिने सा परिवर्धमाना
लब्धोदया चान्द्रमसीव लेखा ।
पुपोष लावण्यमयान्विशेषा-
ञ्ज्योत्स्नान्तराणीव कलान्तराणि ॥
लब्धोदया चान्द्रमसीव लेखा ।
पुपोष लावण्यमयान्विशेषा-
ञ्ज्योत्स्नान्तराणीव कलान्तराणि ॥
अन्वयः
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दिने दिने परिवर्धमाना लब्धोदया चान्द्रमसी लेखा इव सा लावण्यमयान् विशेषान् पुपोष, ज्योत्स्नान्तराणि कलान्तराणि इव।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
दिन इति ॥ लब्ध उदयो यया सा लब्धोदया । उत्पन्नेत्यर्थः । अभ्युदितेत्यन्यत्र दिने दिने प्रतिदिनम् । `नित्यवीप्सयोः` (अष्टाध्यायी ८.१.४ ) इति वीप्सायां द्विरुक्तिः । परिवर्धमाना । उभयत्र समानमेतत् । सा बाला । चन्द्रमस इयं चान्द्रमसी लेखेव लावण्यमयान्कान्तिविशेषप्रचुरान् । `मुक्ताफलेषु छायायास्तरलत्वमिवान्तरा । प्रतिभाति यदङ्गेषु तल्लावण्यमिहोच्यते ॥` इति भूपालः । विशेषानवयवान् । `विशेषोऽवयवे व्यक्तौ` इत्युत्पलमालायाम् । ज्योत्स्नायामन्तरमन्तर्धानं येषां तानि ज्योत्स्नान्तराणि ज्योत्स्नायान्तर्हितानि । तन्मयानीति यावत् । अन्याः कलाः कलान्तराणीव सुप्सुपेति समासः । `स्थानात्मीयान्यतादर्थ्यरन्ध्रान्तर्धिषु चान्तरम्` इति शाश्वतः । पुपोषोपचितवती । इयं वाक्योपमेत्याह दण्डी । तल्लक्षणं तु- `वाक्यार्थेनैव वाक्यार्थः काऽपि यद्युपमीयते । एकानेकेव शब्दत्वात् सा तु वाक्योपमा द्विधा ॥` इति
Summary
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Growing day by day, she, having risen like the crescent of the moon, nourished special qualities born of loveliness, just as the moon's phases nourish their respective portions of moonlight.
सारांश
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चंद्रमा की रेखा के समान दिनों-दिन बढ़ती हुई उस कन्या ने अपने लावण्य से वैसी ही शोभा प्राप्त की, जैसे चंद्रमा अपनी बढ़ती कलाओं के साथ चांदनी को पुष्ट करता है।
पदच्छेदः
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| दिने | दिन (७.१) | Day |
| दिने | दिन (७.१) | by day |
| सा | तद् (१.१) | she |
| परिवर्धमाना | परिवर्धमान (परि√वृध्+शानच्, १.१) | growing |
| लब्धोदया | लब्ध (√लभ्+क्त)–उदय (१.१) | who had attained her rise |
| चान्द्रमसीव | चान्द्रमसी (१.१)–इव | like the lunar |
| लेखा | लेखा (१.१) | crescent |
| पुपोष | पुपोष (√पुष् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | nourished |
| लावण्यमयान् | लावण्यमय (२.३) | born of loveliness |
| विशेषान् | विशेष (२.३) | special qualities |
| ज्योत्स्नान्तराणीव | ज्योत्स्ना–अन्तर (२.३)–इव | like the portions of moonlight |
| कलान्तराणि | कला–अन्तर (२.३) | the other phases |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दि | ने | दि | ने | सा | प | रि | व | र्ध | मा | ना |
| ल | ब्धो | द | या | चा | न्द्र | म | सी | व | ले | खा |
| पु | पो | ष | ला | व | ण्य | म | या | न्वि | शे | षा |
| ञ्ज्यो | त्स्ना | न्त | रा | णी | व | क | ला | न्त | रा | णि |
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