गतवति नखलेखालक्ष्यतामङ्गरागे
समददयितपीताताम्रबिम्बाधराणाम् ।
विरहविधुरमिष्टा सत्सखीवङ्गनानां
हृदयमवललम्बे रात्रिसम्भोगलक्ष्मीः ॥
गतवति नखलेखालक्ष्यतामङ्गरागे
समददयितपीताताम्रबिम्बाधराणाम् ।
विरहविधुरमिष्टा सत्सखीवङ्गनानां
हृदयमवललम्बे रात्रिसम्भोगलक्ष्मीः ॥
समददयितपीताताम्रबिम्बाधराणाम् ।
विरहविधुरमिष्टा सत्सखीवङ्गनानां
हृदयमवललम्बे रात्रिसम्भोगलक्ष्मीः ॥
अन्वयः
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अङ्गरागे नख-लेखा-लक्ष्यतां गतवति (सति), समद-दयित-पीत-अताम्र-बिम्ब-अधराणाम् अङ्गनानां विरह-विधुरं हृदयं रात्रि-सम्भोग-लक्ष्मीः इष्टा सत्-सखी इव अवललम्बे।
English Summary
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As the body-paint marked with nail scratches faded, the charm of the night's lovemaking, like a beloved friend, supported the hearts of the women, which were distressed by the thought of impending separation. Their bimba-like lips were pale-red from the kisses of their intoxicated lovers.
सारांश
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अंगराग के स्थान पर नख-क्षत उभर आने और प्रियतमों द्वारा अधर-पान किए जाने के बाद, रात्रि के संभोग की स्मृतियाँ विरह से व्याकुल स्त्रियों के हृदय का सहारा बन गईं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
गतवतीति ॥ अङ्गरागेऽङ्गविलेपने नखलेखासु नखपदेषु लक्ष्यतां दृश्यतां गतवति सति । विमर्दात्तन्मात्रावशेषे सतीत्यर्थः । किं च बिम्बतुल्या अधरा बिम्बाधराः।
शाकपार्थिवादित्वान्मध्यमपदलोपीसमानाधिकरणसमासः इति वामनः । समदैर्दयितैः पीताः पीडिता अत एवातिपीडनादाताम्रा आसमन्ताद्वक्ता बिम्बाधरा यासां तासामङ्गनानां संबन्धि विरहेणाह्रिकेन वियोगेन विधुरं विह्वलं हृदयम् । रात्रिसंभोगलक्ष्मीः। नखपदादिशोभेत्यर्थः । इष्टाप्ता सत्सखीव निपुणसहचरीवावललम्बे धारयामास । प्रियसंभोगचिह्नशोभा स्पष्टा बभूवेत्यर्थः । प्रियोपभोगचिह्नशोभावलोकन लालसाः कथं विरहमसहन्तेत्यर्थः । श्रुतिपूर्णोपमालंकारः। मालिनीवृत्तम् । लक्षणं तूक्तम्
पदच्छेदः
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| गतवति | गतवत् (√गम्+क्तवतु, ७.१) | when had gone |
| नखलेखालक्ष्यताम् | नख–लेखा–लक्ष्यता (२.१) | to the state of being marked by nail-scratches |
| अङ्गरागे | अङ्गराग (७.१) | the cosmetic paint |
| समददयितपीताताम्रबिम्बाधराणाम् | समद–दयित–पीत (√पा+क्त)–अताम्र–बिम्ब–अधर (६.३) | of those whose bimba-like lower lips were made pale-red by their intoxicated lovers' kisses |
| विरहविधुरम् | विरह–विधुर (२.१) | distressed by separation |
| इष्टा | इष्ट (√इष्+क्त, १.१) | beloved |
| सत्सखीव | सत्–सखी–इव | like a good friend |
| अङ्गनानाम् | अङ्गना (६.३) | of the women |
| हृदयम् | हृदय (२.१) | the heart |
| अवललम्बे | अवललम्बे (अव√लम्ब् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | supported |
| रात्रिसम्भोगलक्ष्मीः | रात्रि–सम्भोग–लक्ष्मी (१.१) | the charm of the night's lovemaking |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग | त | व | ति | न | ख | ले | खा | ल | क्ष्य | ता | म | ङ्ग | रा | गे |
| स | म | द | द | यि | त | पी | ता | ता | म्र | बि | म्बा | ध | रा | णाम् |
| वि | र | ह | वि | धु | र | मि | ष्टा | स | त्स | खी | व | ङ्ग | ना | नां |
| हृ | द | य | म | व | ल | ल | म्बे | रा | त्रि | स | म्भो | ग | ल | क्ष्मीः |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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