कान्ताजनं सुरतखेदनिमीलिताक्षं
संवाहितुं समुपयानिव मन्दमन्दम् ।
हर्म्येषु माल्यमदिरापरिभोगगन्धा-
नाविश्चकार रजनीपरिवृत्तिवायुः ॥
कान्ताजनं सुरतखेदनिमीलिताक्षं
संवाहितुं समुपयानिव मन्दमन्दम् ।
हर्म्येषु माल्यमदिरापरिभोगगन्धा-
नाविश्चकार रजनीपरिवृत्तिवायुः ॥
संवाहितुं समुपयानिव मन्दमन्दम् ।
हर्म्येषु माल्यमदिरापरिभोगगन्धा-
नाविश्चकार रजनीपरिवृत्तिवायुः ॥
अन्वयः
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रजनी-परिवृत्ति-वायुः सुरत-खेद-निमीलित-अक्षम् कान्ता-जनम् संवाहितुम् मन्द-मन्दम् समुपयान् इव, हर्म्येषु माल्य-मदिरा-परिभोग-गन्धान् आविश्चकार ।
English Summary
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The wind at the turn of the night (the morning breeze), as if slowly approaching to soothe the beloved women whose eyes were closed from the fatigue of love-making, spread the scents of garlands, wine, and enjoyment throughout the mansions.
सारांश
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रात्रि के अंत में बहने वाली वायु महलों से मालाओं और मदिरा की सुगंध लेकर मंद-मंद चलने लगी, मानो वह रति-थकान से आँखें मूँदे खड़ी स्त्रियों की सेवा करने आई हो।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
कान्तेति ॥ सुरतखेदेन निमीलितान्यक्षीणि येन तं कान्ताजनं स्त्रीसमूहं संवाहितुं सेवितुमिव । खेदापनोदार्थमङ्गमर्दनं कर्तुमिवेत्यर्थः ।
संवाहनं वाहनेऽपि नरादेरङ्ग मर्दने इति विश्वः । वाह प्रयत्ने इति धातोरण्यन्तात्तुमुन् । अन्यथा णिज्ग्रहणे संवाहयितुमितिं स्यात् । मन्दमन्दं मन्दप्रकारम् । प्रकारे गुणवचनस्य (अष्टाध्यायी ८.१.१२ ) इति द्विर्भावे कर्मधारयवद्भावात्सुपो लुक् । समुपयान्संवान् रजनीपरिवृत्तिवायुर्निशावसानमरुत् । हर्म्येषु माल्यानि च मदिरा च परिभोगो विमर्दश्च तेषां गन्धानाविश्चकार । बहिः प्रसारयामासेत्यर्थः । अत्र संवाहितुमिवेत्युत्प्रेक्षा। मान्द्यगुणमूलत्वाद्गुणनिमित्तक्रियाफलोत्प्रेक्षा ॥
पदच्छेदः
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| कान्ताजनम् | कान्ता–जन (२.१) | the beloved women |
| सुरतखेदनिमीलिताक्षम् | सुरत–खेद–निमीलित (नि√मील्+क्त)–अक्षि (२.१) | whose eyes were closed from the fatigue of love-making |
| संवाहितुम् | संवाहितुम् (सम्√वह्+णिच्+तुमुन्) | to soothe |
| समुपयान् | समुपयात् (सम्+उप√या+शतृ, १.१) | approaching |
| इव | इव | as if |
| मन्दमन्दम् | मन्दमन्दम् | slowly |
| हर्म्येषु | हर्म्य (७.३) | in the mansions |
| माल्यमदिरापरिभोगगन्धान् | माल्य–मदिरा–परिभोग–गन्ध (२.३) | the scents of garlands, wine, and enjoyment |
| आविश्चकार | आविश्चकार (आविस्√कृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made manifest |
| रजनीपरिवृत्तिवायुः | रजनी–परिवृत्ति–वायु (१.१) | the wind at the turn of the night |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| का | न्ता | ज | नं | सु | र | त | खे | द | नि | मी | लि | ता | क्षं |
| सं | वा | हि | तुं | स | मु | प | या | नि | व | म | न्द | म | न्दम् |
| ह | र्म्ये | षु | मा | ल्य | म | दि | रा | प | रि | भो | ग | ग | न्धा |
| ना | वि | श्च | का | र | र | ज | नी | प | रि | वृ | त्ति | वा | युः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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