अन्वयः
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लोचन-अधर-कृत-आहृत-रागा, वासित-आनन-विशेषित-गन्धा वारुणी पर-गुण-आत्म-गुणानाम् व्यत्ययम् नु विनिमयम् नु वितेने ।
English Summary
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The wine, which took its redness from the eyes and lips and whose fragrance was enhanced by the perfumed faces, seemed to cause a transposition, or perhaps an exchange, between its own qualities and the qualities of others (the women).
सारांश
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मदिरा ने नेत्रों और अधरों की लाली को हर लिया और बदले में मुख को अपनी सुगंध दे दी; मानो उसने और स्त्रियों के अंगों ने अपने गुणों का परस्पर विनिमय कर लिया हो।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
लोचनेति ॥ लोचने चाधरश्च लोचनाधरम् ।
समुद्राभ्राद्धः- इति व्यभिचारज्ञापकान्नात्राधरशब्दस्य पूर्वनिपातः । कृतश्चासावाहृतश्चेति विशेषणसमासः । लोचनाधरस्य कृताहृतो रागो यया सा तथोक्ता । लोचनयोः कृतरागाधरादासमन्ताद्धृतरागा चेत्यर्थः । षष्ठ्याश्चार्थसंबन्धात्सामान्यस्य योग्यविशेषे पर्यवसाननियमेनाधिकरणापादानार्थयोराक्षेपात् । तथा चाधरलोचनगुणयो रागतद्विरहयोः स्थानपरिवृत्तिं कृतवतीत्यर्थः । तथा वासितेन स्वगन्धसंक्रान्तिसुरभितेनाननेन विशेषितोऽतिशयितो गन्धो यस्याः सा । यद्वा वासितानना चासावर्थादाननेनैव विशेषितगन्धा चेति कृतबहुव्रीहिविशेषणसमासः। उभयथाप्याननसंक्रान्तस्वगन्धा स्वसंक्रान्ताननगन्धा चेत्यर्थः । एवंभूता वारुणी मदिरा परगुणात्मगुणानां परयोर्लोचनाधरयोर्गुणौ च परस्याननस्य गुण आत्मनो वारुण्या गुणश्च परगुणात्मगुणास्तेषां परगुणात्मगुणानां व्यत्ययं नु विनिमयं नु चितेने विस्तारयामास । चित्तेन प्रामादिकी वस्तुपरिवृत्तिर्व्यत्ययः । बुद्धिपूर्वा तु विनिमयः। अत्र तन्त्रोच्चरितस्य परगुणशब्दस्यावृत्त्या परगुणौ च परगुणात्मगुणौ चेति विग्रहः कथंचिदगत्या सोढव्यः । उपमानपूर्वपदबहुव्रीहिवत् । तथा चायमर्थः । परगुणयोरधरलोचनगुणयो रागतद्विरहयोर्व्यत्ययं नु विनिमयं नु वितेने । तथा परगुणात्मगुणयोराननगन्धात्मगन्धयोश्च व्यत्ययं तु विनिमयं नु वितेने। अन्यथा कथमन्यस्मिन्नन्यधर्मोपलम्भः संभवतीति भावः। अत्र लोचनाधररागयोस्तदभावयोर्वा भेदेऽप्यभेदाध्यवसायादेकत्ववाचो युक्तिः । तस्मात्तन्मूलातिशयोक्त्यनुप्राणिता चेयं व्यत्ययविनिमययोरन्यतरकरणोत्प्रेक्षेति संक्षेपः।सा च प्रतीयमाना। व्यञ्जकाप्रयोगात्। नुशब्दस्तु संशये ॥
पदच्छेदः
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| लोचनाधरकृताहृतरागा | लोचन–अधर–कृत (√कृ+क्त)–आहृत (आ√हृ+क्त)–राग (१.१) | which took its redness from the eyes and lips |
| वासिताननविशेषितगन्धा | वासित (√वस्+णिच्+क्त)–आनन–विशेषित (वि√शिष्+णिच्+क्त)–गन्ध (१.१) | whose fragrance was enhanced by the perfumed faces |
| वारुणी | वारुणी (१.१) | the wine |
| परगुणात्मगुणानाम् | पर–गुण–आत्मन्–गुण (६.३) | of others' qualities and its own qualities |
| व्यत्ययम् | व्यत्यय (२.१) | transposition |
| विनिमयम् | विनिमय (२.१) | exchange |
| नु | नु | or |
| वितेने | वितेने (वि√तन् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | caused |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| लो | च | ना | ध | र | कृ | ता | हृ | त | रा | गा |
| वा | सि | ता | न | न | वि | शे | षि | त | ग | न्धा |
| वा | रु | णी | प | र | गु | णा | त्म | गु | णा | नां |
| व्य | त्य | यं | वि | नि | म | यं | नु | वि | ते | ने |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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