निमीलदाकेकरलोचचक्षुषां
प्रियोपकण्ठं कृतगात्रवेपथुः ।
निमज्जतीनां श्वसितोद्धतस्तनः
श्रमो नु तासां मदनो नु पप्रथे ॥
निमीलदाकेकरलोचचक्षुषां
प्रियोपकण्ठं कृतगात्रवेपथुः ।
निमज्जतीनां श्वसितोद्धतस्तनः
श्रमो नु तासां मदनो नु पप्रथे ॥
प्रियोपकण्ठं कृतगात्रवेपथुः ।
निमज्जतीनां श्वसितोद्धतस्तनः
श्रमो नु तासां मदनो नु पप्रथे ॥
अन्वयः
AI
निमीलत्-आकेकर-लोल-चक्षुषाम्, प्रिय-उपकण्ठम् कृत-गात्र-वेपथुः, श्वसित-उद्धत-स्तनः (च) निमज्जतीनाम् तासाम् श्रमः नु मदनः नु (इति) पप्रथे।
English Summary
AI
Of those women bathing near their beloveds—their eyes closing, half-shut, and unsteady—was it fatigue or was it passion that became manifest, causing their limbs to tremble and their breasts to heave with sighs?
सारांश
AI
प्रिय के समीप जल में डूबती स्त्रियों के कांपते शरीर और ऊँची साँसों को देखकर यह समझना कठिन था कि यह तैरने की थकान है या काम-विकार का प्रभाव।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
निमीलदिति ॥ प्रियोपकण्ठं प्रियसमीपे । अत्यन्तसंयोगे द्वितीया । निमज्जतीनां विगाहमानानामतएव निमीलन्ति निमिषन्त्याकेकराण्याकेकरवन्ति लोलानि चक्षूंषि यासां तासाम् । आकेकरलक्षणं तु नृत्यविलासे-
दृष्टिराकेकरा किंचित्स्फुटापाङ्गे प्रसारिता । मीलितार्धपुटा लोके ताराव्यावर्तनोत्तरा इति । तासां स्त्रीणाम् । कृतो गात्राणां वेपथुः कम्पो येन सः । श्वसितैर्निःश्वासैरुद्धतावुत्पतितौ स्तनौ येन सः। श्रमः खेदो तु भदनो नु पप्रथे प्रादुर्बभूव । निमज्जनप्रियसंनिधानरूपोभयकारणसंभवान्नेत्रनिमीलनगात्रकम्पनिःश्वासधारणाञ्च संदेहः । स एवालंकारः ॥
पदच्छेदः
AI
| निमीलदाकेकरलोचचक्षुषां | निमीलत् (नि√मील्+शतृ)–आकेकर–लोल–चक्षुस् (६.३) | of those whose eyes were closing, half-shut, and unsteady, |
| प्रियोपकण्ठं | प्रिय–उपकण्ठम् (२.१) | near their beloveds, |
| कृतगात्रवेपथुः | कृत (√कृ+क्त)–गात्र–वेपथु (१.१) | which caused the limbs to tremble, |
| निमज्जतीनां | निमज्जत् (नि√मस्ज्+शतृ, ६.३) | of those who were bathing, |
| श्वसितोद्धतस्तनः | श्वसित–उद्धत–स्तन (१.१) | which caused the breasts to heave with sighs, |
| श्रमः | श्रम (१.१) | fatigue |
| नु | नु | or |
| तासां | तद् (६.३) | of them, |
| मदनः | मदन (१.१) | passion |
| नु | नु | or |
| पप्रथे | पप्रथे (√प्रथ् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | became manifest? |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | मी | ल | दा | के | क | र | लो | च | च | क्षु | षां |
| प्रि | यो | प | क | ण्ठं | कृ | त | गा | त्र | वे | प | थुः |
| नि | म | ज्ज | ती | नां | श्व | सि | तो | द्ध | त | स्त | नः |
| श्र | मो | नु | ता | सां | म | द | नो | नु | प | प्र | थे |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.