रामाणामवजितमाल्यसौकुमार्ये
सम्प्राप्ते वपुषि सहत्वमातपस्य ।
गन्धर्वैरधिगतविस्मयैः प्रतीये
कल्याणी विधिषु विचित्रता विधातुः ॥
रामाणामवजितमाल्यसौकुमार्ये
सम्प्राप्ते वपुषि सहत्वमातपस्य ।
गन्धर्वैरधिगतविस्मयैः प्रतीये
कल्याणी विधिषु विचित्रता विधातुः ॥
सम्प्राप्ते वपुषि सहत्वमातपस्य ।
गन्धर्वैरधिगतविस्मयैः प्रतीये
कल्याणी विधिषु विचित्रता विधातुः ॥
अन्वयः
AI
रामाणाम् अवजितमाल्यसौकुमार्ये वपुषि आतपस्य सहत्वम् सम्प्राप्ते सति, अधिगतविस्मयैः गन्धर्वैः विधातुः विधिषु कल्याणी विचित्रता प्रतीये ।
English Summary
AI
When the bodies of the beautiful women, which surpassed even the delicacy of flower garlands, attained the ability to endure the sun's heat, the wonder-struck Gandharvas perceived the auspicious and wondrous variety in the Creator's methods.
सारांश
AI
फूलों से भी कोमल अंगों वाली उन स्त्रियों के शरीर जब सूर्य के ताप को सहने में समर्थ दिखे, तब गंधर्व विधाता की इस विचित्र और कल्याणकारी रचना को देखकर चकित रह गए।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
रामाणामिति ॥ मालैव माल्यं तस्य सौकुमार्यमवजितं येन तस्सिन् । कुसुमादपि सुकुमार इत्यर्थः । रामाणां वपुष्यातपस्य । कृद्योगे कर्मणि षष्ठी। सहत इति सहः क्षमः। पचाद्यच् । तस्य भावः सहत्वम् । तत्संप्राप्ते सत्यधिगतविस्मयैः संप्राप्ताश्चर्यैर्गन्धर्वैर्विधातुर्विधिषु सृष्टिषु कल्याणी साधीयसी । उपकारकत्वादिति भावः । विचित्रता नानाविधत्वं प्रतीयेऽवगता ज्ञाता । प्रतिपूर्वादिणः कर्मणि लिट् ॥
पदच्छेदः
AI
| रामाणाम् | रामा (६.३) | of the beautiful women |
| अवजितमाल्यसौकुमार्ये | अवजित (अव√जि+क्त)–माल्य–सौकुमार्य (७.१) | which surpassed the delicacy of garlands |
| सम्प्राप्ते | सम्प्राप्त (सम्+प्र√आप्+क्त, ७.१) | having attained |
| वपुषि | वपुस् (७.१) | the body |
| सहत्वम् | सहत्व (२.१) | the ability to endure |
| आतपस्य | आतप (६.१) | of the sun's heat |
| गन्धर्वैः | गन्धर्व (३.३) | by the Gandharvas |
| अधिगतविस्मयैः | अधिगत (अधि√गम्+क्त)–विस्मय (३.३) | who were filled with wonder |
| प्रतीये | प्रतीये (प्रति√इ भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was perceived |
| कल्याणी | कल्याणी (१.१) | auspicious |
| विधिषु | विधि (७.३) | in the creations |
| विचित्रता | विचित्रता (१.१) | variety |
| विधातुः | विधातृ (६.१) | of the Creator |
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | मा | णा | म | व | जि | त | मा | ल्य | सौ | कु | मा | र्ये |
| स | म्प्रा | प्ते | व | पु | षि | स | ह | त्व | मा | त | प | स्य |
| ग | न्ध | र्वै | र | धि | ग | त | वि | स्म | यैः | प्र | ती | ये |
| क | ल्या | णी | वि | धि | षु | वि | चि | त्र | ता | वि | धा | तुः |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.