राजद्भिः पथि मरुतामभिन्नरूपै-
रुल्कार्चिः स्फुटगतिभिर्ध्वजाङ्कुशानाम् ।
तेजोभिः कनकनिकाषराजिगौरै-
रायामः क्रियत इव स्म सातिरेकः ॥
राजद्भिः पथि मरुतामभिन्नरूपै-
रुल्कार्चिः स्फुटगतिभिर्ध्वजाङ्कुशानाम् ।
तेजोभिः कनकनिकाषराजिगौरै-
रायामः क्रियत इव स्म सातिरेकः ॥
रुल्कार्चिः स्फुटगतिभिर्ध्वजाङ्कुशानाम् ।
तेजोभिः कनकनिकाषराजिगौरै-
रायामः क्रियत इव स्म सातिरेकः ॥
अन्वयः
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मरुताम् पथि अभिन्नरूपैः उल्कार्चिःस्फुटगतिभिः कनकनिकाषराजिगौरैः राजद्भिः ध्वजाङ्कुशानाम् तेजोभिः आयामः सातिरेकः क्रियते इव स्म ।
English Summary
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On the path of the gods, the expanse seemed as if it were being enhanced by the splendors of the banners and goads. These splendors, shining as brightly as a streak of gold on a touchstone and moving as clearly as a meteor's flame, were indistinguishable from the path itself.
सारांश
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आकाश मार्ग में ध्वजाओं और अंकुशों की स्वर्ण जैसी कांति उल्काओं के समान चमक रही थी, जिससे वह मार्ग अत्यंत विस्तृत और शोभायमान प्रतीत हो रहा था।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
राजद्भिरिति॥मरुतां पथ्याकाशे राजद्भिर्दीप्यमानैरभिन्नरूपैरविच्छिन्नाकारैरत एवोल्कानामर्चीषीव स्फुटगतीनिदीप्तमार्गाणि येषां तैः। कनकस्य निकाषः कषणं तस्य राजी रेखा तद्वदौरैररुणैः।
गौरः पीतेऽरुणे श्वेते इति विश्वः । ध्वजांशुकानां तेजोभिः पताकाकान्तिभिरायामस्तेषामेव दैर्घ्यं सातिरेकः सातिशयः क्रियते सेव कृत इव । दीर्घा ध्वजपटाः स्वतेजःप्रसारेण दीर्घतमा इव लक्ष्यन्त इवेत्युत्प्रेक्षा । सा चोल्काद्युपमानुप्राणिता ॥
पदच्छेदः
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| राजद्भिः | राजत् (√राज्+शतृ, ३.३) | by the shining |
| पथि | पथिन् (७.१) | on the path |
| मरुताम् | मरुत् (६.३) | of the gods |
| अभिन्नरूपैः | अभिन्न–रूप (३.३) | with indistinguishable form |
| उल्कार्चिःस्फुटगतिभिः | उल्का–अर्चिस्–स्फुट–गति (३.३) | whose movement was as clear as a meteor's flame |
| ध्वजाङ्कुशानाम् | ध्वज–अङ्कुश (६.३) | of the banners and goads |
| तेजोभिः | तेजस् (३.३) | by the splendors |
| कनकनिकाषराजिगौरैः | कनक–निकाष–राजि–गौर (३.३) | as bright as a streak of gold on a touchstone |
| आयामः | आयाम (१.१) | the expanse |
| क्रियते | क्रियते (√कृ भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is made |
| इव | इव | as if |
| स्म | स्म | (makes past tense) |
| सातिरेकः | स–अतिरेक (१.१) | enhanced |
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | ज | द्भिः | प | थि | म | रु | ता | म | भि | न्न | रू | पै |
| रु | ल्का | र्चिः | स्फु | ट | ग | ति | भि | र्ध्व | जा | ङ्कु | शा | नाम् |
| ते | जो | भिः | क | न | क | नि | का | ष | रा | जि | गौ | रै |
| रा | या | मः | क्रि | य | त | इ | व | स्म | सा | ति | रे | कः |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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