तिष्ठद्भिः कथमपि देवतानुभावा-
दाकृष्टैः प्रजविभिरायतं तुरङ्गैः ।
नेमीनामसति विवर्तने रथौघै-
रासेदे वियति विमानवत्प्रवृत्तिः ॥
तिष्ठद्भिः कथमपि देवतानुभावा-
दाकृष्टैः प्रजविभिरायतं तुरङ्गैः ।
नेमीनामसति विवर्तने रथौघै-
रासेदे वियति विमानवत्प्रवृत्तिः ॥
दाकृष्टैः प्रजविभिरायतं तुरङ्गैः ।
नेमीनामसति विवर्तने रथौघै-
रासेदे वियति विमानवत्प्रवृत्तिः ॥
अन्वयः
AI
देवतानुभावात् कथमपि तिष्ठद्भिः प्रजविभिः तुरङ्गैः आयतम् आकृष्टैः रथौघैः नेमीनाम् विवर्तने असति वियति विमानवत् प्रवृत्तिः आसेदे ।
English Summary
AI
Pulled straight ahead by swift horses that remained stationary in the air with great difficulty due to divine power, the multitude of chariots moved through the sky like celestial cars, as their wheel-rims did not turn.
सारांश
AI
देवताओं के प्रभाव से तीव्रगामी घोड़ों द्वारा खींचे गए रथों के पहिए आकाश में बिना घूमे ही सरक रहे थे, जिससे वे रथ विमानों की भाँति प्रतीत हो रहे थे।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
तिष्ठद्भिरिति ॥ कथमपि बाढम् । 'कथमादि तथाप्यन्ते यत्ने गौरवबाढयोः इति वैजयन्ती । देवतानामनुभावात्तिष्ठद्भिः। अपतद्भिरित्यर्थः । रथविशेषणमेतत् । प्रजविभिर्वेगवद्भिस्तुरङ्गैरायतं दूरमाकृष्टै रथौधैर्वियत्याकाशे नेमीनां चक्रधाराणाम् । 'चक्रधाराप्रधिर्नेमिः' इति यादवः। विवर्तने भ्रमणेऽसति विमानवद्विमानानामिवेत्युपमा ।
तत्र तस्येव (अष्टाध्यायी ५.१.११६ ) इति वतिप्रत्ययः । प्रवृत्तिर्गतिरासेदे प्राता । सदेः कर्मणि लिट् ॥
पदच्छेदः
AI
| तिष्ठद्भिः | तिष्ठत् (√स्था+शतृ, ३.३) | by the standing |
| कथमपि | कथम्–अपि | somehow |
| देवतानुभावात् | देवता–अनुभाव (५.१) | due to divine power |
| आकृष्टैः | आकृष्ट (आ√कृष्+क्त, ३.३) | by the pulled |
| प्रजविभिः | प्रजविन् (३.३) | by the swift |
| आयतम् | आयतम् | straight |
| तुरङ्गैः | तुरङ्ग (३.३) | by the horses |
| नेमीनाम् | नेमि (६.३) | of the wheel-rims |
| असति | असत् (√अस्+शतृ, ७.१) | in the absence of |
| विवर्तने | विवर्तन (७.१) | of rolling |
| रथौघैः | रथ–ओघ (३.३) | by the multitude of chariots |
| आसेदे | आसेदे (आ√सद् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was obtained |
| वियति | वियत् (७.१) | in the sky |
| विमानवत् | विमानवत् | like a celestial car |
| प्रवृत्तिः | प्रवृत्ति (१.१) | movement |
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ति | ष्ठ | द्भिः | क | थ | म | पि | दे | व | ता | नु | भा | वा |
| दा | कृ | ष्टैः | प्र | ज | वि | भि | रा | य | तं | तु | र | ङ्गैः |
| ने | मी | ना | म | स | ति | वि | व | र्त | ने | र | थौ | घै |
| रा | से | दे | वि | य | ति | वि | मा | न | व | त्प्र | वृ | त्तिः |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.