आकीर्णं बलरजसा घनारुणेन
प्रक्षोभैः सपदि तरङ्गितं तटेषु ।
मातङ्गोन्मथितसरोजरेणुपिङ्गं
माञ्जिष्ठं वसनमिवाम्बु निर्बभासे ॥
आकीर्णं बलरजसा घनारुणेन
प्रक्षोभैः सपदि तरङ्गितं तटेषु ।
मातङ्गोन्मथितसरोजरेणुपिङ्गं
माञ्जिष्ठं वसनमिवाम्बु निर्बभासे ॥
प्रक्षोभैः सपदि तरङ्गितं तटेषु ।
मातङ्गोन्मथितसरोजरेणुपिङ्गं
माञ्जिष्ठं वसनमिवाम्बु निर्बभासे ॥
अन्वयः
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घन-अरुणेन बल-रजसा आकीर्णम्, सपदि प्रक्षोभैः तटेषु तरङ्गितम्, मातङ्ग-उन्मथित-सरोज-रेणु-पिङ्गम् अम्बु, माञ्जिष्ठम् वसनम् इव निर्बभासे ।
English Summary
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The water, filled with the deep red dust of the army, quickly made wavy at the banks by the commotion, and colored yellowish-brown by the pollen of lotuses crushed by the elephants, shone like a deep red cloth.
सारांश
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सेना की लाल धूल और कुचले हुए कमलों के पराग से रंजित नदी का जल किसी रंगे हुए सुंदर वस्त्र की भाँति चमक रहा था।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
आकीर्णमिति ॥ घनारुणेन सान्द्रलोहितेन। विशेषणसमासः। बलरजसा सेनापरागेणाकीर्णं सपदि प्रक्षोभैरालोडनैस्तटेषु तीरेषु तरङ्गितं संजाततरङ्गम् । तारकादित्वादितच् । यद्धा । तरङ्गवत्कृतम् । मत्वन्तात्
तत्करोति इति णिचि कर्मणि क्तः। णाविष्टवद्भावान्मतुपो लुक् । तथा मातडैरुन्मथितानां लुलितानां सरोजानां रेणुभिः पिङ्गं पिशङ्गमम्बु माञ्जिष्ठेन महारजनेनारक्तं माञ्जिष्ठं वसनमिव निर्बभासे । तेन रक्तं- (अष्टाध्यायी ४.२.१ ) इत्यण् । कौशेयम् इति वा पाठे कोशाङ्ढञ् । कौशेयं कृमिकोशोत्थम् इत्यमरः (अमरकोशः २.६.११२ ) ॥ श्रीमद्भिर्नियमितकंधरापरान्तैः संसक्तैरगुरुवनेषु साङ्गहारम् । संप्रापे निसृतमदाम्बुभिर्गजेन्द्रैःप्रस्यन्दिप्रचलितगण्डशैलशोभा
पदच्छेदः
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| आकीर्णं | आकीर्ण (आ√कॄ+क्त, १.१) | filled |
| बलरजसा | बल–रजस् (३.१) | with the dust of the army |
| घनारुणेन | घन–अरुण (३.१) | which was deep red |
| प्रक्षोभैः | प्रक्षोभ (प्र√क्षुभ्+घञ्, ३.३) | by the agitations |
| सपदि | सपदि | quickly |
| तरङ्गितं | तरङ्गित (१.१) | made wavy |
| तटेषु | तट (७.३) | at the banks |
| मातङ्ग | मातङ्ग | undefined |
| उन्मथित | उन्मथित (उद्√मथ्+क्त) | undefined |
| सरोज | सरोज | undefined |
| रेणु | रेणु | undefined |
| पिङ्गं | पिङ्ग (१.१) | yellowish-brown with the pollen of lotuses crushed by the elephants |
| माञ्जिष्ठं | माञ्जिष्ठ (१.१) | deep red |
| वसनम् | वसन (१.१) | a cloth |
| इव | इव | like |
| अम्बु | अम्बु (१.१) | the water |
| निर्बभासे | निर्बभासे (निर्√भास् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | shone |
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | की | र्णं | ब | ल | र | ज | सा | घ | ना | रु | णे | न |
| प्र | क्षो | भैः | स | प | दि | त | र | ङ्गि | तं | त | टे | षु |
| मा | त | ङ्गो | न्म | थि | त | स | रो | ज | रे | णु | पि | ङ्गं |
| मा | ञ्जि | ष्ठं | व | स | न | मि | वा | म्बु | नि | र्ब | भा | से |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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