क्लान्तोऽपि त्रिदशवधूजनः पुरस्ता-
ल्लीनाहिश्वसितविलोलपल्लवानाम् ।
सेव्यानां हतविनयैरिवावृतानां
सम्पर्कं परिहरति स्म चन्दनानाम् ॥
क्लान्तोऽपि त्रिदशवधूजनः पुरस्ता-
ल्लीनाहिश्वसितविलोलपल्लवानाम् ।
सेव्यानां हतविनयैरिवावृतानां
सम्पर्कं परिहरति स्म चन्दनानाम् ॥
ल्लीनाहिश्वसितविलोलपल्लवानाम् ।
सेव्यानां हतविनयैरिवावृतानां
सम्पर्कं परिहरति स्म चन्दनानाम् ॥
अन्वयः
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क्लान्तः अपि त्रिदश-वधू-जनः पुरस्तात् लीन-अहि-श्वसित-विलोल-पल्लवानाम्, हत-विनयैः इव आवृतानाम्, सेव्यानाम् चन्दनानाम् सम्पर्कम् परिहरति स्म ।
English Summary
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Though weary, the celestial ladies avoided contact with the sandalwood trees in front of them. Although these trees were worthy of being approached, their leaves trembled from the hissing of hidden snakes, making them seem as if they were surrounded by ill-mannered people.
सारांश
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थकी हुई देवस्त्रियों ने सर्पों से घिरे चंदन के वृक्षों का त्याग कर दिया, जैसे लोग दुष्टों के नियंत्रण वाले सज्जनों की संगति से दूर रहते हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
क्लान्त इति ॥ क्लान्तोऽपि त्रिदशवधूजनः पुरस्तादग्रे लीनानां संश्रितानामहीनां श्वसितैर्निःश्वासैर्विलोलाः पल्लवा येषां तेषां चन्दनानां संपर्कं हतविनयैर्दुर्जनैः खलैरावृतानां संवृतानां सेव्यानां प्रभूणां संपर्कमिव परिहरति स्म । दुष्टयद्दुष्टसंसृष्टा गुणाख्या अपि त्याज्या इति भावः ॥ उत्कृष्टध्वजकुथकङ्कटा धरित्रीमानीता विदितनयैः श्रमं विनेतुम् । आक्षिप्तद्रुमगहना युगान्तवातैः पर्यस्ता गिरय इव द्विपा विरेजुः
पदच्छेदः
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| क्लान्तः | क्लान्त (√क्लम्+क्त, १.१) | weary |
| अपि | अपि | even though |
| त्रिदशवधूजनः | त्रिदश–वधू–जन (१.१) | the celestial ladies |
| पुरस्तात् | पुरस्तात् | in front |
| लीन | लीन (√ली+क्त) | undefined |
| अहि | अहि | undefined |
| श्वसित | श्वसित (√श्वस्+क्त) | undefined |
| विलोल | विलोल | undefined |
| पल्लवानाम् | पल्लव (६.३) | of those whose tender leaves were trembling from the hissing of hidden snakes |
| सेव्यानां | सेव्य (√सेव्+ण्यत्, ६.३) | of those worthy of being resorted to |
| हतविनयैः | हत (√हन्+क्त)–विनय (३.३) | by ill-mannered people |
| इव | इव | as if |
| आवृतानां | आवृत (आ√वृ+क्त, ६.३) | surrounded |
| सम्पर्कं | सम्पर्क (सम्√पृच्+घञ्, २.१) | contact |
| परिहरति | परिहरति (परि√हृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | avoided |
| स्म | स्म | (past tense marker) |
| चन्दनानाम् | चन्दन (६.३) | of the sandalwood trees |
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्ला | न्तो | ऽपि | त्रि | द | श | व | धू | ज | नः | पु | र | स्ता |
| ल्ली | ना | हि | श्व | सि | त | वि | लो | ल | प | ल्ल | वा | नाम् |
| से | व्या | नां | ह | त | वि | न | यै | रि | वा | वृ | ता | नां |
| स | म्प | र्कं | प | रि | ह | र | ति | स्म | च | न्द | ना | नाम् |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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