सम्भिन्नामविरलपातिभिर्मयूखै-
र्नीलानां भृशमुपमेखलं मणीनाम् ।
विच्छिनामिव वनिता नभोन्तराले
वप्राम्भःस्रुतिमवलोकयांबभूवुः ॥
सम्भिन्नामविरलपातिभिर्मयूखै-
र्नीलानां भृशमुपमेखलं मणीनाम् ।
विच्छिनामिव वनिता नभोन्तराले
वप्राम्भःस्रुतिमवलोकयांबभूवुः ॥
र्नीलानां भृशमुपमेखलं मणीनाम् ।
विच्छिनामिव वनिता नभोन्तराले
वप्राम्भःस्रुतिमवलोकयांबभूवुः ॥
अन्वयः
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वनिताः नभोन्तराले नीलानां मणीनाम् अविरलपातिभिः मयूखैः सम्भिन्नाम्, उपमेखलं विच्छिन्नाम् इव वप्राम्भःस्रुतिम् अवलोकयांबभूवुः ।
English Summary
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The women beheld the stream of water flowing down the mountain slope. In the sky, it appeared mixed with the densely falling rays of blue sapphires from their ornaments, and near the mountain's girdle, it seemed as if it were broken or intermittent.
सारांश
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पर्वत के ढलानों पर नीलमणि की किरणों से युक्त जलधाराओं को अप्सराओं ने आकाश में किसी सुंदरी के फटे हुए वस्त्र या टूटी हुई मणियों की माला के समान देखा।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
संभिन्नामिति ॥ अविरलपातिभिर्निरन्तरप्रसारिभिरुपमेखलम् । तटेष्वित्यर्थः ।
अथ मेखला । श्रोणिस्थानेऽद्रिकटके कटिबन्धेऽसिबन्धने इति यादवः । नीलानां मणीनां मयूखैर्भृशं संभिन्नामेकीभूतामतएव नभोन्तराले विच्छिन्नमिव स्थितामित्युत्प्रेक्षा । वप्राम्भःस्रुतिं वप्रोदकधारां वनिता अवलोकयांबभूवुः । वप्राम्भ:स्रुतेः स्वधवलिमत्यागेनेन्द्रनीलानां नीलिमस्वीकाररूपतद्गुणोत्थापिता विच्छेदोत्प्रेक्षेति तयोरङ्गाङ्गिभावेन संकरः। तेन च नैल्यविच्छेदभ्रमरूपो भ्रान्तिमान्व्यज्यते ॥
पदच्छेदः
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| सम्भिन्नाम् | सम्भिन्न (सम्√भिद्+क्त, २.१) | mixed with |
| अविरलपातिभिः | अविरल–पातिन् (३.३) | by the densely falling |
| मयूखैः | मयूख (३.३) | with rays |
| नीलानाम् | नील (६.३) | of blue |
| भृशम् | भृशम् | greatly |
| उपमेखलम् | उपमेखलम् | near the mountain girdle |
| मणीनाम् | मणि (६.३) | of sapphires |
| विच्छिन्नाम् | विच्छिन्न (वि√छिद्+क्त, २.१) | broken |
| इव | इव | as if |
| वनिताः | वनिता (१.३) | the women |
| नभोन्तराले | नभस्–अन्तराल (७.१) | in the sky |
| वप्राम्भःस्रुतिम् | वप्र–अम्भस्–स्रुति (२.१) | the stream of water from the slope |
| अवलोकयांबभूवुः | अवलोकयांबभूवुः (अव√लोक् +णिच्+आम् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | beheld |
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | म्भि | न्ना | म | वि | र | ल | पा | ति | भि | र्म | यू | खै |
| र्नी | ला | नां | भृ | श | मु | प | मे | ख | लं | म | णी | नाम् |
| वि | च्छि | ना | मि | व | व | नि | ता | न | भो | न्त | रा | ले |
| व | प्रा | म्भः | स्रु | ति | म | व | लो | क | यां | ब | भू | वुः |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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