सोत्कण्ठैरमरगणैरनुप्रकीर्णा-
न्निर्याय ज्वलितरुचः पुरान्मघोनः ।
रामाणामुपरि विवस्वतः स्थितानां
नासेदे चरितगुणत्वमातपत्रैः ॥
सोत्कण्ठैरमरगणैरनुप्रकीर्णा-
न्निर्याय ज्वलितरुचः पुरान्मघोनः ।
रामाणामुपरि विवस्वतः स्थितानां
नासेदे चरितगुणत्वमातपत्रैः ॥
न्निर्याय ज्वलितरुचः पुरान्मघोनः ।
रामाणामुपरि विवस्वतः स्थितानां
नासेदे चरितगुणत्वमातपत्रैः ॥
अन्वयः
AI
मघोनः ज्वलितरुचः पुरात् निर्याय सोत्कण्ठैः अमरगणैः अनुप्रकीर्णान्, विवस्वतः उपरि स्थितानाम् रामाणाम् आतपत्रैः चरितगुणत्वम् न आसेदे ।
English Summary
AI
As the women departed from Indra's city of blazing splendor, followed by eager hosts of gods, the parasols held above them against the sun failed to serve their purpose, as the women's divine nature made them immune to the heat.
सारांश
AI
इंद्र की प्रज्वलित नगरी से निकलकर उत्सुक देवों के साथ जब सेना चली, तब सूर्य से भी ऊँचे स्थित होने के कारण स्त्रियों के ऊपर लगे छतरों की उपयोगिता समाप्त हो गई।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
सोत्कण्ठैरिति ॥सोत्कण्ठैः । अवेक्षणोत्सुकैरित्यर्थः । अमरगणैरनुप्रकीर्णादाकीर्णाज्ज्वलितरुचो दीप्तप्रभान्मघोन इन्द्रस्य पुरादमरावत्या निर्याय निर्गत्य । यातेः क्त्वो ल्यप् । विवस्वत उपरि स्थितानां रामाणाम्। आतपात्त्रायन्त इत्यातपत्रैः।
सुपि-इति योगविभागात्कप्रत्ययः । चरितगुणत्वं सार्थकत्वं नासेदे न प्रापे । तासां सूर्योपरिस्थितत्वादातपासंभवादिति भावः ॥
पदच्छेदः
AI
| सोत्कण्ठैः | स–उत्कण्ठा (३.३) | by the eager |
| अमरगणैः | अमर–गण (३.३) | by the hosts of gods |
| अनुप्रकीर्णान् | अनुप्रकीर्ण (अनु+प्र√कॄ+क्त, २.३) | followed after |
| निर्याय | निर्याय (निर्√या+ल्यप्) | having departed |
| ज्वलितरुचः | ज्वलित (√ज्वल्+क्त)–रुच् (५.१) | from the one with blazing splendor |
| पुरात् | पुर (५.१) | from the city |
| मघोनः | मघवन् (६.१) | of Indra |
| रामाणाम् | रामा (६.३) | of the beautiful women |
| उपरि | उपरि | above |
| विवस्वतः | विवस्वत् (६.१) | of the sun |
| स्थितानाम् | स्थित (√स्था+क्त, ६.३) | of those who were situated |
| न | न | not |
| आसेदे | आसेदे (आ√सद् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was obtained |
| चरितगुणत्वम् | चरित–गुण–त्व (१.१) | the quality of having served its purpose |
| आतपत्रैः | आतपत्र (३.३) | by the parasols |
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सो | त्क | ण्ठै | र | म | र | ग | णै | र | नु | प्र | की | र्णा |
| न्नि | र्या | य | ज्व | लि | त | रु | चः | पु | रा | न्म | घो | नः |
| रा | मा | णा | मु | प | रि | वि | व | स्व | तः | स्थि | ता | नां |
| ना | से | दे | च | रि | त | गु | ण | त्व | मा | त | प | त्रैः |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.