संसिद्धाविति करणीयसंनिबद्धै-
रालापैः पिपतिषतां विलङ्घ्य वीथीम् ।
आसेदे दशशतलोचनध्वजिन्या
जीमूतैरपिहितसानुरिन्द्रकीलः ॥
संसिद्धाविति करणीयसंनिबद्धै-
रालापैः पिपतिषतां विलङ्घ्य वीथीम् ।
आसेदे दशशतलोचनध्वजिन्या
जीमूतैरपिहितसानुरिन्द्रकीलः ॥
रालापैः पिपतिषतां विलङ्घ्य वीथीम् ।
आसेदे दशशतलोचनध्वजिन्या
जीमूतैरपिहितसानुरिन्द्रकीलः ॥
अन्वयः
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इति करणीयसंनिबद्धैः आलापैः वीथीं विलङ्घ्य पिपतिषतां (तेषाम्) संसिद्धौ (सत्याम्), दशशतलोचनध्वजिन्या जीमूतैः अपिहितसानुः इन्द्रकीलः आसेदे ।
English Summary
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Thus, as they were conversing about the task to be accomplished, having crossed the sky and wishing to descend, the army of Indra reached Mount Indrakila, whose peaks were covered by clouds, upon the completion of their journey.
सारांश
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अपने कार्यों की चर्चा करते हुए इंद्र की सेना नक्षत्रों के मार्ग को पार कर इंद्रकील पर्वत पर पहुँची, जिसके शिखरों को बादलों ने ढँक रखा था।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
संसिद्धाविति ॥ संसिद्धौ कार्यसिद्धिविषय इतीत्थंभाविना प्रकारेण । कर्तव्यमिति करणीयं तेन संनिबद्धै:। संयोजितैरित्यर्थः।आलापैराभाषणैरुपलक्षितया।
स्यादाभाषणमालापः इत्यमरः (अमरकोशः १.६.१५ ) । दशशतानि संख्या येषु तानि लोचनानि यस्य सः । सहस्रलोचन इत्यर्थः । तस्य ध्वजिन्या सेनया पिपतिषतां पक्षिणां वीथीं मार्गम्। पित्सन्तो नभसङ्गमाः इत्यमरः (अमरकोशः २.५.३६ ) । तनिपति-इत्यादिना विकल्पादिडागमः।विलङ्घ्य जीमूतैर्जीवस्योदकस्य मूतः पटबन्धो येषां ते तैः। पृषोदरादित्वात्साधुः । अपिहितसानुराच्छादिततटः। उन्नत इत्यर्थः । इन्द्रकील आसेदे प्राप्तः । सीदतेः कर्मणि लिट् ॥
पदच्छेदः
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| संसिद्धौ | संसिद्ध (सम्√सिध्+क्त, ७.१) | on the accomplishment |
| इति | इति | thus |
| करणीयसंनिबद्धैः | करणीय (√कृ+अनीयर्)–सम्–निबद्ध (३.३) | connected with the task to be done |
| आलापैः | आलाप (३.३) | with conversations |
| पिपतिषताम् | पिपतिषत् (√पत्+सन्+शतृ, ६.३) | of those wishing to descend |
| विलङ्घ्य | विलङ्घ्य (वि√लङ्घ्+ल्यप्) | having crossed |
| वीथीम् | वीथी (२.१) | the path (sky) |
| आसेदे | आसेदे (आ√सद् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was reached |
| दशशतलोचनध्वजिन्या | दशशतलोचन–ध्वजिनी (३.१) | by the army of the thousand-eyed one (Indra) |
| जीमूतैः | जीमूत (३.३) | by the clouds |
| अपिहितसानुः | अपिहित (अपि√धा+क्त)–सानु (१.१) | whose peaks were covered |
| इन्द्रकीलः | इन्द्रकील (१.१) | Mount Indrakila |
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | सि | द्धा | वि | ति | क | र | णी | य | सं | नि | ब | द्धै |
| रा | ला | पैः | पि | प | ति | ष | तां | वि | ल | ङ्घ्य | वी | थीम् |
| आ | से | दे | द | श | श | त | लो | च | न | ध्व | जि | न्या |
| जी | मू | तै | र | पि | हि | त | सा | नु | रि | न्द्र | की | लः |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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