सम्भिन्नैरिभतुरगावगाहनेन
प्राप्योर्वीरनुपदवीं विमानपङ्क्तीः ।
तत्पूर्वं प्रतिविदधे सुरापगाया
वप्रान्तस्खलितविवर्तनं पयोभिः ॥
सम्भिन्नैरिभतुरगावगाहनेन
प्राप्योर्वीरनुपदवीं विमानपङ्क्तीः ।
तत्पूर्वं प्रतिविदधे सुरापगाया
वप्रान्तस्खलितविवर्तनं पयोभिः ॥
प्राप्योर्वीरनुपदवीं विमानपङ्क्तीः ।
तत्पूर्वं प्रतिविदधे सुरापगाया
वप्रान्तस्खलितविवर्तनं पयोभिः ॥
अन्वयः
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इभतुरगावगाहनेन सम्भिन्नैः पयोभिः विमानपङ्क्तीः अनुपदवीम् ऊर्वीः प्राप्य सुरापगायाः वप्रान्तस्खलितविवर्तनं तत्पूर्वम् प्रतिविदधे ।
English Summary
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The waters of the celestial river, agitated by the plunging of elephants and horses, having reached the vast expanses along the track of the celestial cars, for the first time performed the act of stumbling and turning back at their banks.
सारांश
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हाथियों और घोड़ों के उतरने से मथ गया आकाशगंगा का जल विमानों के मार्ग तक पहुँच गया और तटों से टकराता हुआ वैसे ही बहने लगा जैसे वह स्वर्ग से गिरते समय बहा था।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
संभिन्नैरिति ॥ इभतुरगावगाहनेन हस्त्यश्वावलोडनेन संभिन्नैः संक्षुभितैः सुरापगायाः पयोभिः कर्तृभिः पदवीमनु । पदव्यामित्यर्थः ।
लक्षणेत्थंभूत- इत्यादिना कर्मप्रवचनीयत्वाद्द्वितीया । उर्वीर्विपुला विमानपङ्क्ती: प्राप्य । तदेव पूर्वं तत्पूर्वमिदं प्रथमं यथा तथाकाशगङ्गायास्तटाभावादिति भावः । वप्रान्तेषु रोधोभूमिषु स्खलितानि तैर्विवर्तनं प्रत्यावृत्तिर्वप्रान्तस्खलितविवर्तनं तटान्तस्खलनप्रतिवर्तनम् । वप्रः पितरि केदारेवप्रःप्राकाररोधसोः इति वैजयन्ती। प्रतिविदधे चक्र इत्यतिशयोक्तिः॥
पदच्छेदः
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| सम्भिन्नैः | सम्भिन्न (सम्√भिद्+क्त, ३.३) | by the mixed/agitated |
| इभतुरगावगाहनेन | इभ–तुरग–अवगाहन (३.१) | by the plunging of elephants and horses |
| प्राप्य | प्राप्य (प्र√आप्+ल्यप्) | having reached |
| ऊर्वीः | ऊर्वी (२.३) | the expanses |
| अनुपदवीम् | अनुपदवीम् | along the track of |
| विमानपङ्क्तीः | विमान–पङ्क्ति (२.३) | the rows of celestial cars |
| तत्पूर्वम् | तत्पूर्वम् | for the first time |
| प्रतिविदधे | प्रतिविदधे (प्रति+वि√धा कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | performed |
| सुरापगायाः | सुर–आपगा (६.१) | of the celestial river |
| वप्रान्तस्खलितविवर्तनम् | वप्र–अन्त–स्खलित–विवर्तन (२.१) | the stumbling and turning at the banks |
| पयोभिः | पयस् (३.३) | the waters |
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | म्भि | न्नै | रि | भ | तु | र | गा | व | गा | ह | ने | न |
| प्रा | प्यो | र्वी | र | नु | प | द | वीं | वि | मा | न | प | ङ्क्तीः |
| त | त्पू | र्वं | प्र | ति | वि | द | धे | सु | रा | प | गा | या |
| व | प्रा | न्त | स्ख | लि | त | वि | व | र्त | नं | प | यो | भिः |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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