प्रणतिमथ विधाय प्रस्थिताः सद्मनस्ताः
स्तनभरनमिताङ्गीरङ्गनाः प्रीतिभाजः ।
अचलनलिनलक्ष्मीहारि नालं बभूव
स्तिमितममरभर्तुर्द्रष्टुमक्ष्णां सहस्रम् ॥
प्रणतिमथ विधाय प्रस्थिताः सद्मनस्ताः
स्तनभरनमिताङ्गीरङ्गनाः प्रीतिभाजः ।
अचलनलिनलक्ष्मीहारि नालं बभूव
स्तिमितममरभर्तुर्द्रष्टुमक्ष्णां सहस्रम् ॥
स्तनभरनमिताङ्गीरङ्गनाः प्रीतिभाजः ।
अचलनलिनलक्ष्मीहारि नालं बभूव
स्तिमितममरभर्तुर्द्रष्टुमक्ष्णां सहस्रम् ॥
अन्वयः
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अथ प्रणतिम् विधाय सद्मनः प्रस्थिताः प्रीतिभाजः स्तनभरनमिताङ्गीः ताः अङ्गनाः द्रष्टुम् अमरभर्तुः स्तिमितम् अचलनलिनलक्ष्मीहारि अक्ष्णाम् सहस्रम् अलम् न बभूव ।
English Summary
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Then, after making their obeisance, those joyful women, whose bodies were bent by the weight of their breasts, set out from the palace. To see them, the thousand steady eyes of Indra, which rivaled the beauty of unmoving lotuses, were not enough.
सारांश
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प्रणाम करके वहां से प्रस्थान करती हुई उन सुंदरियों की शोभा, जो अपने शारीरिक भार से झुकी हुई थीं, इंद्र की एक हजार स्थिर आंखें भी पूरी तरह देखने में समर्थ नहीं हो पा रही थीं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
प्रणतिमिति ॥ अथ प्रणतिं विधाय सद्मन इन्द्रभवनात्प्रस्थिताः प्रचलिताः स्तनभरैर्नमितान्यङ्गानि यासां ताः ।
अङ्गगात्रकण्ठेभ्यो वक्तव्यम् इति ङीप् । प्रीतिभाजः स्वामिसंभावनया संतुष्टास्ता अङ्गना अचलनलिनानां स्थिरकमलानां लक्ष्मीर्हरतीति तत्तथोक्तम् । तद्वन्मनोहरमित्यर्थः । कुतः स्तिमितं विस्मयंनिश्चलममरभर्तुरक्ष्णां सहस्त्रं कर्तृ द्रष्टुमलं समर्थं न बभूव । तासां सौन्दर्यसागरस्योद्वेलत्वादिति भावः । अत्रोपमालंकारः
पदच्छेदः
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| प्रणतिम् | प्रणति (२.१) | obeisance |
| अथ | अथ | then |
| विधाय | विधाय (वि√धा+ल्यप्) | having performed |
| प्रस्थिताः | प्रस्थित (प्र√स्था+क्त, १.३) | set out |
| सद्मनः | सद्मन् (५.१) | from the palace |
| ताः | तद् (२.३) | those |
| स्तनभरनमिताङ्गीः | स्तन–भर–नमित (√नम्+क्त)–अङ्गी (२.३) | whose bodies were bent by the weight of their breasts |
| अङ्गनाः | अङ्गना (२.३) | women |
| प्रीतिभाजः | प्रीति–भाज् (२.३) | possessing joy |
| अचलनलिनलक्ष्मीहारि | अचल–नलिन–लक्ष्मी–हारिन् (१.१) | captivating the beauty of unmoving lotuses |
| न | न | not |
| अलम् | अलम् | sufficient |
| बभूव | बभूव (√भू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
| स्तिमितम् | स्तिमित (√स्तिम्+क्त, १.१) | steady |
| अमरभर्तुः | अमर–भर्तृ (६.१) | of the master of the gods |
| द्रष्टुम् | द्रष्टुम् (√दृश्+तुमुन्) | to see |
| अक्ष्णाम् | अक्षि (६.३) | of the eyes |
| सहस्रम् | सहस्र (१.१) | a thousand |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | ण | ति | म | थ | वि | धा | य | प्र | स्थि | ताः | स | द्म | न | स्ताः |
| स्त | न | भ | र | न | मि | ता | ङ्गी | र | ङ्ग | नाः | प्री | ति | भा | जः |
| अ | च | ल | न | लि | न | ल | क्ष्मी | हा | रि | ना | लं | ब | भू | व |
| स्ति | मि | त | म | म | र | भ | र्तु | र्द्र | ष्टु | म | क्ष्णां | स | ह | स्रम् |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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