पृथुदाम्नि तत्र परिबोधि च मा
भवतीभिरन्यमुनिवद्विकृतिः ।
स्वयशांसि विक्रमवतामवतां
न वधूष्वघानि विमृष्यन्ति धियः ॥
पृथुदाम्नि तत्र परिबोधि च मा
भवतीभिरन्यमुनिवद्विकृतिः ।
स्वयशांसि विक्रमवतामवतां
न वधूष्वघानि विमृष्यन्ति धियः ॥
भवतीभिरन्यमुनिवद्विकृतिः ।
स्वयशांसि विक्रमवतामवतां
न वधूष्वघानि विमृष्यन्ति धियः ॥
अन्वयः
AI
तत्र पृथु-दाम्नि (पुरुषे) भवतीभिः अन्य-मुनि-वत् विकृतिः मा च परिबोधि । विक्रम-वताम् अवताम् धियः स्व-यशांसि (विमृष्यन्ति), वधूषु अघानि न विमृष्यन्ति ।
English Summary
AI
"And do not think that a change can be wrought in that man of great glory as in other sages. The minds of the valiant and protective consider their own fame; they do not contemplate committing sins against women."
सारांश
AI
आप उसे अन्य ऋषियों के समान विचलित होने वाला न समझें। अपने यश की रक्षा करने वाले पराक्रमी पुरुषों की बुद्धि स्त्रियों के प्रति पापपूर्ण विचार नहीं करती।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
पृथ्विति॥ पृथुधाम्निमहातेजसि तत्र तस्मिन्पुरुषविषयेऽन्यमुनिवदन्यस्मिन्मुनाविव।
तत्र तस्येव (अष्टाध्यायी ५.१.११६ ) इति वतिप्रत्ययः । विकृतिः कोपविकारश्च भवतीभिर्मा परिबोधि मा विज्ञायि। मा शङ्कीति यावत् । बुध्यतेः कर्मणि लुङ् । माङ्योगादाशीरथैऽडागमाभावश्च । तथा हि । स्वयशांस्यवतां रक्षताम् । यशोधनानामित्यर्थः । विक्रमवतां धियश्चित्तानि वधूषु स्त्रीविषयेष्वधानि व्यसनानि । 'दुःखैनोव्यसनेष्वधम्” इति वैजयन्ती। न विमृषन्ति। अर्थान्तरन्यासः। स्त्री हिंसायाः शूराणां यशोहानिकरत्वान्न सर्वथा वो हिनस्ति स इत्यर्थः ॥
पदच्छेदः
AI
| पृथुदाम्नि | पृथुदामन् (७.१) | in that man of great glory |
| तत्र | तत्र | in him |
| परिबोधि | परिबोधि (परि√बुध् +णिच् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) म.पु. एक.) | be thought |
| च | च | and |
| मा | मा | let not |
| भवतीभिः | भवत् (३.३) | by you |
| अन्यमुनिवत् | अन्यमुनिवत् | as in other sages |
| विकृतिः | विकृति (१.१) | a change |
| स्वयशांसि | स्वयशस् (२.३) | their own fame |
| विक्रमवताम् | विक्रमवत् (६.३) | of the valiant |
| अवताम् | अवत् (√अव+शतृ, ६.३) | and protective |
| न | न | not |
| वधूषु | वधू (७.३) | against women |
| अघानि | अघ (२.३) | sins |
| विमृष्यन्ति | विमृष्यन्ति (वि√मृश् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | contemplate |
| धियः | धी (१.३) | the minds |
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पृ | थु | दा | म्नि | त | त्र | प | रि | बो | धि | च | मा |
| भ | व | ती | भि | र | न्य | मु | नि | व | द्वि | कृ | तिः |
| स्व | य | शां | सि | वि | क्र | म | व | ता | म | व | तां |
| न | व | धू | ष्व | घा | नि | वि | मृ | ष्य | न्ति | धि | यः |
| स | ज | स | स | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.