अविमृष्यमेतदभिलष्यति स
द्विषतां वधेन विषयाभिरतिम् ।
भववीतये न हि तथा स विधिः
क्व शरासनं क्व च विमुक्तिपथः ॥
अविमृष्यमेतदभिलष्यति स
द्विषतां वधेन विषयाभिरतिम् ।
भववीतये न हि तथा स विधिः
क्व शरासनं क्व च विमुक्तिपथः ॥
द्विषतां वधेन विषयाभिरतिम् ।
भववीतये न हि तथा स विधिः
क्व शरासनं क्व च विमुक्तिपथः ॥
अन्वयः
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सः द्विषताम् वधेन विषय-अभिरतिम् अभिलष्यति, एतत् अविमृष्यम् । हि भव-वीतये तथा सः विधिः न (भवति) । शरासनम् क्व, विमुक्ति-पथः च क्व?
English Summary
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"He desires worldly pleasures through the slaughter of his enemies; this is ill-considered. Such a method is certainly not for liberation. Where is the bow, and where is the path to salvation? They are utterly incompatible."
सारांश
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वह बिना सोचे-समझे शत्रुओं के वध के माध्यम से विषयों के भोग की इच्छा कर रहा है। मोक्ष प्राप्ति का यह मार्ग नहीं है; क्योंकि धनुष धारण करने और मोक्ष के मार्ग में कोई समानता नहीं है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अविमृष्येति ॥ हे अप्सरसः, स पुरुषो द्विषतां शत्रूणां वधेन शत्रुहननद्वारा विषयाभिरतिं विषयसुखमभिलष्यति वाञ्छति ।
वा भ्राश- (अष्टाध्यायी ३.१.७० ) इत्यादिना श्यन्प्रत्ययः। एतद्विषयासक्तत्वमविमृष्यमविचार्यम् । अविमृष्यमसंदिग्धव्यमिति । 'ऋदुपधाच्चक्ळृपिचृतेः' इति क्यम् । भवतीभिर्न संदिग्धव्यमित्यर्थः । हि यस्मात्स विधिः स बिभर्ति भीषणभुजङ्गभुजः' इत्यादिश्लोकोक्त्तोऽनुष्ठानप्रकारो भववीतये संसारमुक्तये न भवति । कुत इत्याह-शरासनं धनुः क्व, विमुक्ते: पन्थाश्च क्व । द्वयं परस्परं विरुद्धमित्यर्थः । न खलु हिंसासाध्या मुक्तिरिति भावः । अर्थान्तरन्यासोऽलंकारः ॥ न च शापभयमपि संभाव्यमस्मादित्याह—पृथुधाम्नि तत्र परिबोधि च मा भवतीभिरन्यमुनिवद्विकृतिः । स्वयशांसि विक्रमवतामवतां न वधूष्वघानि विमृषन्ति धियः
पदच्छेदः
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| अविमृष्यम् | अविमृष्य (वि√मृश्+ण्यत्, २.१) | ill-considered |
| एतत् | एतद् (१.१) | this is |
| अभिलष्यति | अभिलष्यति (अभि√लष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | desires |
| सः | तद् (१.१) | He |
| द्विषताम् | द्विषत् (६.३) | of his enemies |
| वधेन | वध (३.१) | through the slaughter |
| विषयाभिरतिम् | विषय–अभिरति (२.१) | worldly pleasures |
| भववीतये | भव–वीति (४.१) | for liberation |
| न | न | not |
| हि | हि | certainly |
| तथा | तथा | such |
| सः | तद् (१.१) | that |
| विधिः | विधि (१.१) | is the method |
| क्व | क्व | Where is |
| शरासनम् | शरासन (१.१) | the bow |
| क्व | क्व | and where is |
| च | च | and |
| विमुक्तिपथः | विमुक्ति–पथ (१.१) | the path to salvation |
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | वि | मृ | ष्य | मे | त | द | भि | ल | ष्य | ति | स |
| द्वि | ष | तां | व | धे | न | वि | ष | या | भि | र | तिम् |
| भ | व | वी | त | ये | न | हि | त | था | स | वि | धिः |
| क्व | श | रा | स | नं | क्व | च | वि | मु | क्ति | प | थः |
| स | ज | स | स | ||||||||
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