अन्वयः
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विदिताः विहित-आनतयः (वनचराः) प्रविश्य, अधिकृत-कृत्य-विधौ शिथिलीकृते (सति), गोत्रभिदे अनपेत-कालम् अभिराम-कथाः इति कथयांबभूवुः ।
English Summary
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Having been recognized and allowed entry, the spies, after making their obeisance and when the formal duties of the officials were relaxed, narrated the following pleasing account to Indra at the appropriate time.
सारांश
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उन किरातों ने इंद्र की सभा में प्रवेश कर उन्हें प्रणाम किया। जब इंद्र अपने कार्यों से निवृत्त हुए, तब उचित अवसर पाकर उन्होंने अत्यंत रोचक ढंग से अर्जुन के तप का वृत्तांत सुनाना आरंभ किया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
विदिता इति ॥ वनचरा इत्यनुवर्तनीयम्। विदिता ज्ञाताः । अनुमतप्रवेशाः सन्त इत्यर्थः । प्रविश्य विहितानतयः कृतप्रणामा अधिकृतकृत्यस्य नियुक्तकर्मणः शैलरक्षणात्मकस्य विधावनुष्ठाने शिथिलीकृते सति । अनपेतकालमनतिक्रान्तकालं यथा तथा गोत्रभिदे शकायेति वक्ष्यमाणप्रकारेणाभिरामकथाः श्राव्यवाचः ।
चिन्तिपूजिकथिकुम्बिचर्चश्च (अष्टाध्यायी ३.३.१०५ ) इत्यङ्प्रत्ययः । कथयांबभूवुः ॥
पदच्छेदः
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| विदिताः | विदित (√विद्+क्त, १.३) | Having been recognized |
| प्रविश्य | प्रविश्य (प्र√विश्+ल्यप्) | having entered |
| विहितानतयः | विहित–आनति (१.३) | having made their obeisance |
| शिथिलीकृते | शिथिलीकृत (√कृ+च्वि+क्त, ७.१) | when were relaxed |
| अधिकृतकृत्यविधौ | अधिकृत–कृत्य–विधि (७.१) | the formal duties of the officials |
| अनपेतकालम् | अनपेत–काल (२.१) | at the appropriate time |
| अभिरामकथाः | अभिराम–कथा (२.३) | the pleasing account |
| कथयांबभूवुः | कथयांबभूवुः (√कथ् +आम् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | narrated |
| इति | इति | thus |
| गोत्रभिदे | गोत्रभित् (४.१) | to Indra (the splitter of mountains) |
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | दि | ताः | प्र | वि | श्य | वि | हि | ता | न | त | यः |
| शि | थि | ली | कृ | ते | ऽधि | कृ | त | कृ | त्य | वि | धौ |
| अ | न | पे | त | का | ल | म | भि | रा | म | क | थाः |
| क | थ | यां | ब | भू | वु | रि | ति | गो | त्र | भि | दे |
| स | ज | स | स | ||||||||
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